अजमेर नगर निगम चुनाव: बोर्ड बनाने के लिए कांग्रेस ने की थी एड़ी चोटी का जोर, फिर भी बाजी मार ले गई बीजेपी राजस्थान 2 घंटे पहले 3
राजस्थान के अजमेर नगर निगम चुनाव में बहुमत के करीब होने के बावजूद कांग्रेस अपना मेयर नहीं बना पाई। कड़ी बाड़ाबंदी और कर्नाटक तक की यात्रा करने के बाद भी कांग्रेस के पार्षदों और निर्दलीयों ने वोटिंग के दौरान पार्टी का साथ छोड़ दिया, जिससे बीजेपी ने बाजी जीत ली।

अजमेर की जंग: कागजी गणित बनाम जमीनी हकीकत

राजस्थान में हालिया निकाय चुनाव के परिणाम कांग्रेस के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं रहे। अजमेर नगर निगम का चुनाव इसके सबसे सटीक उदाहरण के तौर पर सामने आया है। अजमेर में कांग्रेस ने अपना बोर्ड स्थापित करने के लिए हर संभव कोशिश की और तमाम राजनीतिक हथकंडे अपनाए, लेकिन अंत में परिणाम उनके पक्ष में नहीं रहे। भारी मशक्कत और बाड़ाबंदी के बावजूद कांग्रेस अपने मिशन में विफल साबित हुई। बीजेपी ने न केवल अपनी रणनीति को धार दी, बल्कि कांग्रेस की घेराबंदी में सेंधमारी करते हुए अपना मेयर कुर्सी पर बैठा दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने कांग्रेस के सामने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, जिन पर अब पार्टी मंथन करने में जुटी है।

चुनाव का गणित और कांग्रेस की उम्मीदें

अजमेर नगर निगम में कुल 80 वार्ड हैं। चुनावी आंकड़ों की बात करें तो कांग्रेस 37 पार्षदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। वहीं, बीजेपी के पास 32 पार्षद थे और 11 निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। बहुमत का जादुई आंकड़ा 41 था, जिसके लिए कांग्रेस को महज 4 और वोटों की आवश्यकता थी। पार्टी को पूरी उम्मीद थी कि वह निर्दलीयों और अपने पार्षदों के भरोसे इस लक्ष्य को आसानी से हासिल कर लेगी। दावे तो यह भी किए जा रहे थे कि कांग्रेस ने 3 निर्दलीय पार्षदों को अपने साथ जोड़ लिया है, जिससे उनका आंकड़ा सुरक्षित दिख रहा था।

बाड़ाबंदी का कर्नाटक कनेक्शन

कांग्रेस ने अपने पार्षदों को एकजुट रखने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। किसी भी प्रकार की तोड़फोड़ या खरीद-फरोख्त से बचने के लिए पार्षदों को अजमेर या राजस्थान की सीमाओं से बाहर ले जाने का निर्णय लिया गया। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी धर्मेंद्र राठौड़ की देखरेख में पार्षदों को हवाई मार्ग से कर्नाटक भेजा गया। बेंगलुरु में उनकी बाड़ाबंदी की गई, जहाँ खुद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी उनसे मुलाकात की। यह कदम पार्टी की गंभीरता को दर्शाता था कि वे किसी भी कीमत पर अजमेर की सीट गंवाना नहीं चाहते थे।

जयपुर से अजमेर तक का सफर

मतदान से ठीक एक दिन पहले यानी रविवार को, कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल के साथ सभी पार्षदों को विमान से जयपुर लाया गया। जयपुर पहुंचने पर उन्हें सीधे अशोक गहलोत के आवास पर ले जाया गया, ताकि अंतिम रणनीति को अंतिम रूप दिया जा सके। इस दौरान पार्टी मुस्लिम वर्ग के दो और पार्षदों को अपने पाले में लाने के प्रयास कर रही थी। सोमवार को जब मतदान का दिन आया, तो उन्हें एक बस में बैठाकर कड़ी सुरक्षा के बीच अजमेर ले जाया गया। कांग्रेस की मंशा स्पष्ट थी कि किसी भी सूरत में पाला न बदले, लेकिन अंदरूनी कलह और सेंधमारी ने सारी मेहनत पर पानी फेर दिया।

वोटिंग के दिन कैसे बदली तस्वीर

अजमेर मेयर पद के लिए मुकाबला सीधा था, जहाँ कांग्रेस की ओर से किरण गढ़वाल और बीजेपी की ओर से अनामिका शर्मा आमने-सामने थीं। जब मतों की गिनती हुई, तो स्थिति हैरान करने वाली थी। बीजेपी ने न केवल अपने 32 पार्षदों को सुरक्षित रखा, बल्कि बगावत करके जीते 6 निर्दलीयों को भी अपने साथ जोड़ने में सफलता प्राप्त की। इसके अलावा, कांग्रेस के खेमे से भी सेंधमारी हुई, जिससे परिणाम पूरी तरह पलट गए। अंत में अनामिका शर्मा को 43 वोट मिले, जबकि कांग्रेस प्रत्याशी किरण गढ़वाल को केवल 37 वोटों से ही संतोष करना पड़ा। इस तरह कांग्रेस की कड़ी घेराबंदी धरी की धरी रह गई।

राज्य भर में बीजेपी का दबदबा

राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में से अब तक 10 नगर निगमों में चुनाव प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जिनमें से 7 निगमों—भरतपुर, भीलवाड़ा, उदयपुर, अजमेर, पाली, बीकानेर और अलवर में निकाय प्रमुखों का फैसला आ चुका है। इन 7 में से 6 निगमों पर बीजेपी ने कब्जा कर लिया है। भीलवाड़ा और भरतपुर में तो बीजेपी प्रत्याशी पहले ही निर्विरोध जीत चुके थे। उदयपुर में पार्टी के पास स्पष्ट बहुमत था। दूसरी ओर, कांग्रेस केवल बीकानेर नगर निगम में अपना बोर्ड बनाने में सफल रही, जहाँ उन्हें बहुमत हासिल था। पाली और अजमेर में कांग्रेस की स्थिति मजबूत होने के बावजूद उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा। पाली में तो स्थिति और भी बदतर थी, जहाँ 29 सीटें जीतने के बावजूद उनके 26 पार्षदों ने क्रॉस वोटिंग की और पार्टी को मेयर पद के लिए केवल 3 वोट ही मिले।

निष्कर्ष और राजनीतिक सबक

अजमेर की यह हार कांग्रेस के लिए एक बड़े सबक की तरह है। चाहे वह बाड़ाबंदी हो, बेंगलुरु की यात्रा हो या फिर हाईकमान की सीधी निगरानी, कोई भी तरीका पार्टी के पार्षदों के असंतोष को रोकने में काम नहीं आया। बीजेपी ने जिस तरीके से कांग्रेस के सहयोगियों को तोड़कर अपने पाले में किया, वह राजनीतिक कौशल का एक उदाहरण बन गया है। अजमेर और पाली जैसे निकायों में मिली हार ने कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या केवल बाड़ाबंदी से ही सत्ता को बचाया जा सकता है, या फिर संगठन के भीतर के असंतोष को दूर करना अब समय की सबसे बड़ी मांग है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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