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एक घंटा पहले
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विचारों
भारतीय चुनाव आयोग ने मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया को लेकर एक बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। आयोग ने देश के विभिन्न राज्यों में ऑनलाइन वोटर पंजीकरण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले फॉर्म-6 से विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े अतिरिक्त घोषणापत्र को अब पूरी तरह से हटा दिया है। हालांकि, यह राहत केवल उन्हीं राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मिलेगी जहां मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का कार्य पूरा हो चुका है। चुनाव आयोग की पूरी टीम ने गहन विचार-विमर्श के बाद यह तय किया है कि इस अतिरिक्त घोषणापत्र की जरूरत केवल विशेष पुनरीक्षण अभियान की अवधि के दौरान ही लागू रहनी चाहिए।
इस फैसले के तहत, जिन राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों में अभी भी विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया चल रही है, वहां के आवेदकों को अभी भी ECINET पोर्टल पर यह अतिरिक्त घोषणापत्र जमा करना होगा। इस घोषणापत्र में नए आवेदकों को खुद को या फिर अपने माता-पिता, दादा-दादी अथवा नाना-नानी को पिछले पुनरीक्षण के दौरान तैयार की गई मतदाता सूची से जोड़ने वाली आवश्यक जानकारियां देनी होती हैं।
पोर्टल और मोबाइल ऐप्स से हटाया गया डिक्लेरेशन
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि जिन राज्यों में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का काम पूरा हो चुका है, वहां के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों (CEO) के आधिकारिक पोर्टल्स के साथ-साथ आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म यानी ECINET ऐप और पोर्टल से इस अतिरिक्त घोषणापत्र को हटा दिया गया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब इन राज्यों में नया वोटर आईडी कार्ड बनवाने के इच्छुक आवेदकों को केवल 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत निर्धारित वैधानिक फॉर्म-6 ही भरना होगा।
यह अहम निर्णय मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञान कुमार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी की सदस्यता वाले संपूर्ण चुनाव आयोग के पैनल की 26 सितंबर को हुई बैठक के बाद लिया गया है।
विवाद और चुनाव आयुक्तों की तीखी आपत्तियां
इस घोषणापत्र को लेकर चुनाव आयोग के भीतर काफी समय से विवाद की स्थिति बनी हुई थी। आयोग ने बैठक के बाद दिए अपने स्पष्टीकरण में कहा था कि फॉर्म-6 के साथ जोड़ा गया अतिरिक्त घोषणापत्र केवल विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के लिए ही था, और गैर-SIR अवधि के लिए नियमों (रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960) के अनुसार जो सामान्य फॉर्म तय है, उसी का उपयोग किया जाना चाहिए। यह पूरा मामला तब चर्चा में आया जब यह बात सामने आई कि चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने फॉर्म-6 में किए गए इन बदलावों पर आधिकारिक तौर पर अपनी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई थी। इस विवाद से जुड़ी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं:
- कानूनी फॉर्म-6 की महत्ता: फॉर्म-6 वह मुख्य कानूनी दस्तावेज है जिसका इस्तेमाल देश के योग्य नागरिक मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए करते हैं।
- नियमों में संशोधन की मांग: चुनाव आयुक्त विवेक जोशी का मानना था कि 'रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960' के तहत तय किए गए कानूनी फॉर्म में बिना नियमों में कोई औपचारिक संशोधन किए बदलाव नहीं किया जा सकता। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी उनकी इस राय का पुरजोर समर्थन किया था।
- 'गैर-कानूनी' करार दिया: ऑनलाइन प्रणाली ECINET पर फॉर्म-6 भरने की प्रक्रिया में जब इस SIR से जुड़े अतिरिक्त घोषणापत्र को शामिल किया गया, तो सुखबीर सिंह संधू ने इस कदम को पूरी तरह 'अनधिकृत और गैर-कानूनी' बताते हुए इसे तुरंत हटाने की मांग रख दी थी।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पक्ष: दूसरी तरफ, चुनाव आयोग ने अपने सार्वजनिक बयानों में यह रुख अपनाया कि मूल फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया गया था। यह घोषणापत्र केवल SIR प्रक्रिया के लिए एक अतिरिक्त और अस्थायी आवश्यकता थी। आयोग ने यह भी दलील दी कि बिहार में हुए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इस प्रकार की घोषणा को जायज ठहराया था।
- आंतरिक असहमति की रिपोर्ट: यह पूरा विवाद तब सार्वजनिक हुआ जब समाचार पत्र 'इंडियन एक्सप्रेस' ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया कि चुनाव आयुक्त संधू और जोशी ने पिछले 10 महीनों के दौरान विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े निर्णयों और सरकारी आदेशों पर कम से कम 14 बार आधिकारिक रूप से अपनी असहमति और आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका कहना था कि ये महत्वपूर्ण निर्णय उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना ही ले लिए गए थे।
- सर्वसम्मति का दावा: हालांकि, चुनाव आयोग ने 26 सितंबर को जारी अपने आधिकारिक बयान में इन दावों का खंडन करते हुए कहा कि SIR से जुड़े सभी आदेशों को तीनों चुनाव आयुक्तों की सर्वसम्मति और पूर्ण सहमति से ही मंजूरी दी गई थी।
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