आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की सुनामी का बड़ा असर, स्मार्टफोन से लेकर कारें तक हो सकती हैं महंगी तकनीक 2 महीने पहले 52
AI की बेतहाशा बढ़ती मांग के कारण दुनिया भर में मेमोरी चिप्स का संकट पैदा हो गया है, जिसका सीधा असर आम लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले गैजेट्स की कीमतों पर पड़ने की संभावना है।

AI की बढ़ती भूख का गैजेट्स पर असर

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI का प्रभाव अब केवल नई तकनीकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम उपभोक्ताओं की जेब पर भी सीधा असर डालने की तैयारी में है। दुनिया भर में AI की तकनीक के विस्तार ने चिप बनाने वाली कंपनियों के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। आलम यह है कि आने वाले समय में स्मार्टफोन, लैपटॉप, गेमिंग कंसोल और यहां तक कि आधुनिक कारों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इस महंगाई की मुख्य वजह मेमोरी चिप्स की भारी किल्लत है।

क्यों कम हो रही है सामान्य चिप्स की उपलब्धता?

आजकल की बड़ी टेक कंपनियां जैसे OpenAI, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेज़न और Nvidia अपने AI इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत बनाने के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं। इन AI मॉडल्स को सुचारू रूप से चलाने के लिए हाई बैडविथ मेमोरी यानी HBM की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। इसी मांग को पूरा करने के लिए सैमसंग, SK Hynix और माइक्रोन जैसी चिप निर्माता कंपनियां अपना पूरा ध्यान HBM चिप्स के उत्पादन पर लगा रही हैं।

समस्या यह है कि HBM पर जोर देने के चक्कर में सामान्य DRAM और NAND मेमोरी चिप्स की सप्लाई प्रभावित हो रही है। जहां DRAM स्मार्टफोन और लैपटॉप में अस्थाई मेमोरी का काम करती है, वहीं NAND का उपयोग डेटा स्टोरेज के लिए होता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2026 में वैश्विक स्तर पर तैयार होने वाली कुल मेमोरी चिप्स का लगभग 70% हिस्सा अकेले AI इंडस्ट्री द्वारा ही खपा लिया जाएगा।

कीमतों में कितना उछाल आया है?

चिप मार्केट की इस स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि माइक्रोन ने अपनी हालिया तिमाही की रिपोर्ट में स्वीकार किया है कि DRAM चिप्स की कीमतों में 60% से ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई है। वहीं, NAND चिप्स की कीमतें तो 80% से भी ज्यादा बढ़ चुकी हैं। यह बढ़ती लागत कंपनियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। इसका संकेत पहले ही मिल चुका है, जब ऐपल ने मेमोरी चिप्स की बढ़ती लागत का हवाला देते हुए अपने कुछ आईपैड और मैकबुक मॉडल्स के दामों में बढ़ोतरी की थी।

आम ग्राहकों पर क्या होगा प्रभाव?

अगर चिप्स की यह कमी इसी तरह बनी रहती है, तो इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बनाने वाली कंपनियां अपनी बढ़ी हुई निर्माण लागत का बोझ सीधे ग्राहकों पर डाल सकती हैं। इसके दायरे में निम्नलिखित उत्पाद आ सकते हैं:

  • स्मार्टफोन और टैबलेट
  • लैपटॉप और पर्सनल कंप्यूटर
  • गेमिंग कंसोल
  • क्लाउड सेवाएं
  • आधुनिक कारें जिनमें हजारों सेमीकंडक्टर चिप्स लगते हैं

भारत के लिहाज से देखें तो यह स्थिति और भी महत्वपूर्ण है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्मार्टफोन बाजार होने के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के बड़े वैश्विक केंद्र के रूप में उभर रहा है। ग्लोबल लेवल पर मेमोरी चिप्स की कीमतों में भारी उछाल का सीधा असर भारतीय बाजार में बिकने वाले गैजेट्स पर पड़ना तय है। हालांकि, देश का सेमीकंडक्टर मिशन लंबी अवधि में इस तरह की निर्भरता को कम करने में मददगार साबित हो सकता है। फिलहाल, टेक जगत में चिप्स की इस कमी को लेकर काफी हलचल मची हुई है।

निखिल वर्मा पाबना के टेक्नोलॉजी रिपोर्टर हैं, जो गैजेट्स, ऐप्स और नई तकनीक पर लिखते हैं। स्मार्टफोन, एआई और डिजिटल ट्रेंड्स पर उनकी गहरी समझ है। वे तकनीक की जटिल बातों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाते हैं।

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