दिल्ली
2 घंटे पहले
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दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव के चौंकाने वाले परिणाम
DUSU चुनाव 2026 की मतगणना ने सबको हैरत में डाल दिया है। उपाध्यक्ष पद के लिए चुनावी मैदान में उतरे निर्दलीय प्रत्याशी दीपांशु शौकीन ने बड़े छात्र संगठनों के वर्चस्व को चुनौती देते हुए बड़ी बढ़त हासिल कर ली है। 10वें राउंड की मतगणना के आंकड़े सामने आने के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि शौकीन की लोकप्रियता काफी अधिक है। उन्हें अब तक 15,601 वोट मिल चुके हैं। वहीं, ABVP के इशु मौर्या 7,838 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर हैं और NSUI के वीर चतरथ 2,268 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर बने हुए हैं। दीपांशु शौकीन अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से 7,763 वोटों की भारी बढ़त बनाए हुए हैं, जिससे उनकी स्थिति काफी मजबूत दिख रही है।
छात्रों के बीच गहरी पकड़ और संघर्ष
दीपांशु शौकीन का दावा है कि वह पिछले 4 वर्षों से लगातार दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों के बीच सक्रिय रहे हैं। उनकी कार्यशैली और छात्रों के मुद्दों को उठाने के तरीके ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है। कॉलेज परिसरों में उनकी मौजूदगी और छात्रों के साथ उनका जुड़ाव ही है, जिसने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है।
NSUI से टिकट और आंतरिक मतभेद
टिकट बंटवारे को लेकर मचे विवाद पर दीपांशु शौकीन ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। उनका कहना है कि उन्हें टिकट देने के बदले में संगठन द्वारा तरह-तरह की शर्तों का सामना करना पड़ता था। शौकीन के मुताबिक, उन पर दबाव डाला जाता था कि उनके पास गाड़ियां नहीं हैं, उनका कोई भव्य चुनावी प्रदर्शन नहीं दिख रहा और वह पैसा खर्च करने में पीछे हैं। उन्होंने बताया कि पहले एक पद पर चुनाव लड़ने की चर्चा हुई थी, लेकिन बाद में समीकरण बदल दिए गए। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब अध्यक्ष और सचिव पद के उम्मीदवार तय हुए, तो उन्होंने नामांकन वापस ले लिया। उनके अनुसार NSUI से जुड़े अन्य तीन लोग भी निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं, और संगठन की आंतरिक राजनीति का दोषी उन्हें ठहराना बिल्कुल गलत है।
जीत के बाद का विजन और सत्याग्रह
अपनी संभावित जीत को लेकर दीपांशु ने कहा कि उनकी प्राथमिकता कैंपस में जवाबदेही तय करना है। वह किसी भी छात्र की समस्या को अपनी निजी समस्या मानकर उसके समाधान और अधिकारों के लिए लड़ना चाहते हैं। उन्होंने सत्या निकेतन में हुए दुर्भाग्यपूर्ण हादसे का जिक्र करते हुए बताया कि उन्होंने पीड़ित परिवारों को न्याय और उचित मुआवजा दिलाने के लिए अपना न्याय सत्याग्रह छेड़ रखा है।
नंगे पैर प्रचार करने के पीछे का संकल्प
दीपांशु शौकीन के नंगे पैर प्रचार करने को लेकर हर तरफ चर्चा है। उन्होंने इसका कारण स्पष्ट करते हुए कहा कि यह सत्या निकेतन की घटना के बाद लिया गया उनका एक दृढ़ संकल्प है। उनके लिए पैरों में होने वाला दर्द केवल शारीरिक नहीं, बल्कि उन डेढ़ लाख छात्रों की समस्याओं का अहसास है, जो विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक छात्रों को न्याय नहीं मिल जाता, उनका यह संकल्प जारी रहेगा और वह बिना जूतों के ही अपना संघर्ष जारी रखेंगे।
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