बदलती वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका खुद ही हो रहा अलग-थलग, विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने नए समीकरणों पर रखी बेबाक राय राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 3
नई दिल्ली में आयोजित 'म्यूनिख लीडर्स मीटिंग' में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि अमेरिका अपनी सोची-समझी रणनीति के तहत खुद को वैश्विक मंच पर अलग-थलग कर रहा है, वहीं चीन का उभार और देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा दुनिया को नए रास्ते पर ले जा रही है।

नई दिल्ली में आयोजित 'म्यूनिख लीडर्स मीटिंग' के प्रतिष्ठित मंच से भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने दुनिया के बदलते राजनीतिक और कूटनीतिक हालातों पर एक बेहद गंभीर और गहरा विश्लेषण पेश किया है। उन्होंने वैश्विक परिदृश्य में आ रहे बड़े बदलावों को रेखांकित करते हुए साफ किया कि वर्तमान वैश्विक व्यवस्था दो सबसे बड़े घटनाक्रमों से प्रभावित हो रही है। पहला घटनाक्रम महाशक्ति अमेरिका की प्राथमिकताओं और उसकी सोच में आया भारी बदलाव है, और दूसरा अहम बिंदु चीन का वैश्विक मंच पर एक बड़ी ताकत के रूप में लगातार मजबूत होना है।

विदेश मंत्री ने अपने संबोधन में अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के बदलते समीकरणों का जिक्र करते हुए अमेरिका की विदेश नीति पर खुलकर बात की। उन्होंने बेहद सधे हुए शब्दों में यह स्पष्ट किया कि आज की दुनिया में अमेरिका का जो रुख दिखाई दे रहा है, वह किसी बाहरी दबाव या मजबूरी का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उसकी अपनी खुद की सोची-समझी नीति और प्राथमिकताओं का परिणाम है।

अमेरिका का जानबूझकर अलग-थलग पड़ने का फैसला

एस. जयशंकर ने अमेरिकी विदेश नीति के मौजूदा रुख का विश्लेषण करते हुए एक बहुत बड़ी बात कही। उन्होंने कहा कि आज के समय में वॉशिंगटन ने अपनी प्राथमिकताओं को इस तरह से बदला है कि वह वैश्विक मंच पर पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा अकेला दिखाई देने लगा है। विदेश मंत्री के अनुसार, यह परिस्थिति अमेरिका पर थोपी नहीं गई है, बल्कि यह उसकी अपनी रणनीति और पसंद का हिस्सा है।

बैठक को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा, "इस सभागार में उपस्थित कोई भी व्यक्ति शायद ही इस बात से असहमत होगा कि आज की वैश्विक परिस्थितियों का मुख्य आधार अमेरिका के रुख में आया बड़ा बदलाव है। यह बदलाव पूरी तरह से अमेरिका की अपनी पसंद का नतीजा है। कूटनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो वह जानबूझकर एक ऐसी महाशक्ति की तरह व्यवहार कर रहा है जो खुद को अन्य देशों से दूर या अकेला रख रही है।" इस कूटनीतिक बदलाव ने दुनिया भर के पारंपरिक सुरक्षा और आर्थिक गठबंधनों को गहराई से प्रभावित किया है जिससे नए भू-राजनीतिक समीकरण उभर रहे हैं।

चीन का उभार और खुद को अनोखा मानने की प्रवृत्ति

विश्व व्यवस्था में आ रहे बदलाव के दूसरे पहलू पर बात करते हुए कूटनीति के माहिर खिलाड़ी माने जाने वाले एस. जयशंकर ने चीन के विषय पर भी बेबाकी से अपनी राय रखी। उन्होंने बताया कि इस बदलते वैश्विक घटनाक्रम का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ चीन का निरंतर शक्तिशाली होना है। चीन की आत्म-धारणा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बीजिंग खुद को दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी अलग और विशिष्ट मानता है।

विदेश मंत्री ने कहा, "इस पूरे परिदृश्य का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पहलू निश्चित तौर पर चीन का तेजी से उदय होना है। चीन खुद को एक बेहद अनोखा देश मानता है। यह केवल उसकी अपनी आंतरिक सोच या कल्पित अवधारणा नहीं है, बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक धरातल पर कई मामलों में यह सच भी साबित होता दिखाई देता है।" चीन के इस नजरिए ने वैश्विक राजनीति में शक्ति संतुलन को नए सिरे से परिभाषित किया है।

प्रतिद्वंद्विता का नया दौर: केवल दो देशों तक सीमित नहीं है जंग

विदेश मंत्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि वैश्विक स्तर पर चल रही प्रतिद्वंद्विता अब केवल अमेरिका और चीन जैसी दो बड़ी महाशक्तियों के आपसी टकराव तक सीमित नहीं रह गई है। आज के समय में दुनिया के विभिन्न देश अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए अपने पास मौजूद हर छोटे-बड़े प्रभाव या संसाधन को एक कूटनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हट रहे हैं।

जयशंकर ने कहा, "वर्तमान समय में हम बेहद जटिल और तीव्र प्रतिस्पर्धा देख रहे हैं। यह होड़ अब केवल दो देशों की सीमाओं में बंद नहीं है। आज स्थिति यह हो चुकी है कि किसी भी देश के पास यदि किसी भी क्षेत्र में कोई बढ़त या विशेष ताकत है, तो वह उसका इस्तेमाल दूसरों के खिलाफ एक हथियार या कूटनीतिक सौदेबाजी के तौर पर करने लगा है।" उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि आधुनिक युग में देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक तौर पर गहरा आपसी जुड़ाव होने के बावजूद कूटनीतिक और रणनीतिक मोर्चे पर एक-दूसरे को पछाड़ने की होड़ लगातार बढ़ रही है।

क्या है म्यूनिख लीडर्स मीटिंग?

विदेश मंत्री का यह भाषण जिस मंच पर हुआ, वह अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक चर्चाओं के लिए एक बेहद प्रतिष्ठित माध्यम माना जाता है। म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस द्वारा आयोजित की जाने वाली 'म्यूनिख लीडर्स मीटिंग्स' वैश्विक सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े जटिल मुद्दों पर गंभीर विचार-विमर्श करने के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

इस विशेष बैठक की कुछ प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • इस बैठक में दुनिया भर से कूटनीति, सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़े लगभग 80 शीर्ष स्तर के नीति-निर्माता और विशेषज्ञ एक मंच पर जुटते हैं।
  • ये बैठकें अक्सर दुनिया के अलग-अलग देशों की राजधानियों में साल में एक या दो बार आयोजित की जाती हैं।
  • इन सम्मेलनों का मुख्य उद्देश्य किसी विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र की सुरक्षा और भू-राजनीतिक चुनौतियों पर गहराई से चर्चा करना होता है।
  • यह पूरी चर्चा बंद दरवाजों के पीछे होती है और इसमें 'चैथम हाउस नियम' का कड़ाई से पालन किया जाता है ताकि सभी प्रतिभागी बिना किसी संकोच के खुलकर अपनी राय रख सकें।

इस बैठक के जरिए वैश्विक नेताओं को अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के उतार-चढ़ाव को बारीकी से समझने और भविष्य की रणनीतियां बनाने का अवसर मिलता है, जैसा कि हाल ही में नई दिल्ली की बैठक में देखने को मिला है।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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