क्या ज्ञानेश कुमार ले सकते हैं एकतरफा निर्णय, सुप्रीम कोर्ट में याचिका और सीजेआई सूर्यकांत की बेंच करेगी सुनवाई राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 5
भारत निर्वाचन आयोग के कामकाज और फैसलों को लेकर चल रहे विवाद ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार द्वारा बिना अन्य आयुक्तों की सहमति के निर्णय लेने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई करेगा। याचिका में चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के संवैधानिक स्वरूप पर सवाल उठाए गए हैं।

चुनाव आयोग के फैसलों पर बढ़ा कानूनी विवाद

भारत निर्वाचन आयोग के भीतर फैसलों को लेकर उपजे मतभेदों का मामला अब सड़क से होते हुए सीधे सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुंच गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार वर्तमान में गंभीर सवालों के घेरे में हैं और विपक्ष ने भी उन पर मनमाने ढंग से फैसले लेने के गंभीर आरोप लगाए हैं। इस पूरे प्रकरण में अब सुप्रीम कोर्ट का रुख अहम हो गया है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की तैयारी पूरी हो गई है।

सीनियर वकील विकास सिंह की याचिका

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक महत्वपूर्ण याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका को सीनियर वकील विकास सिंह ने दायर किया है और इसे भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत की बेंच के सामने रखा गया है। याचिका का मुख्य बिंदु यह है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार आयोग की ओर से ऐसे फैसले लेने के लिए अधिकृत हैं, जिनमें अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति या जानकारी शामिल नहीं होती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संस्था है, इसलिए इसके सभी निर्णय सर्वसम्मति या फिर बहुमत के आधार पर ही लिए जाने चाहिए। अदालत ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए अगले सप्ताह सुनवाई करने पर सहमति जता दी है।

चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद के दावे

यह कानूनी विवाद ऐसे समय में गहराया है जब हाल ही में एक प्रमुख समाचार पत्र की रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि पिछले 10 महीनों के दौरान अन्य दो चुनाव आयुक्तों, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम से कम 14 बार आधिकारिक रिकॉर्ड पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां विशेष रूप से मतदाता सूची के SIR यानी 'Special Intensive Revision' से जुड़े आदेशों को लेकर थीं। आयुक्तों का यह कहना था कि ये आदेश उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना ही जारी किए गए थे, जो कि एक गंभीर प्रशासनिक विचलन की ओर इशारा करता है।

राकेश कुमार सिंह की रिट याचिका

गौरतलब है कि यह मामला केवल विकास सिंह की याचिका तक ही सीमित नहीं है। इससे पहले समाजसेवी राकेश कुमार सिंह ने भी संविधान के अनुच्छेद 32 के अंतर्गत एक रिट याचिका दायर की थी। इस याचिका में चुनाव आयोग द्वारा शक्तियों के उपयोग के तरीके को चुनौती दी गई है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अकेले उन संवैधानिक शक्तियों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं जो सामूहिक निर्णय लेने वाली संस्था को सौंपी गई हैं। इस रिट में 'क्यू वारंट' यानी अधिकार-पृच्छा रिट जारी करने की मांग की गई है, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि मुख्य चुनाव आयुक्त किस अधिकार के तहत आयोग के नाम पर निर्णय ले रहे हैं।

संवैधानिक प्रावधान और सामूहिक निर्णय

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों के निर्देशन, नियंत्रण और देखरेख की शक्ति 'आयोग' को प्रदान करता है, न कि किसी एक व्यक्तिगत मुख्य चुनाव आयुक्त को। इसी क्रम में, 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 18 भी स्पष्ट रूप से सामूहिक निर्णय लेने की व्यवस्था को अनिवार्य बनाती है। इस धारा के अनुसार, यदि किसी मामले में आम सहमति नहीं बनती है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर ही लिया जाना चाहिए। याचिका में यह स्पष्ट किया गया है कि यह लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि भारत निर्वाचन आयोग की उस संवैधानिक पहचान को सुरक्षित रखने के लिए है जो सामूहिक जिम्मेदारी पर आधारित है।

याचिका में शामिल प्रमुख आपत्तियां

याचिकाकर्ता ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच के लिखित संचार और फाइल नोटिंग का हवाला देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। याचिका के विवरण के अनुसार, जिन 14 आपत्तियों का जिक्र किया गया है, उनमें निम्नलिखित विषय शामिल हैं:

  • चुनाव आयोग की आधिकारिक मंजूरी के बिना जारी किए गए आदेश और संचार।
  • आयोग की बैठकों से पहले एजेंडा का अभाव और बैठकों के बाद मिनट्स यानी कार्यवृत्त तैयार न करना।
  • बिना उचित मंजूरी के की गई विदेश यात्राएं।
  • मतदाता फॉर्म 6 में किए गए बदलाव।
  • मतदाता सूची के डेटाबेस तक पहुंच की प्रक्रिया।
  • पश्चिम बंगाल में ट्रिब्यूनल के समक्ष अपील दायर करने का मामला।

चुनाव आयोग का आधिकारिक रुख

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने इन आरोपों और मतभेदों की खबरों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि अलग-अलग राय रखना एक सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है। आयोग का आधिकारिक कहना है कि पिछले एक वर्ष में लिए गए सभी निर्णय पूर्ण आयोग की सर्वसम्मति के साथ ही लिए गए हैं। हालांकि, जिस प्रकार से यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है, उससे यह स्पष्ट है कि संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर उठ रहे इन सवालों का जवाब अदालत को ही देना होगा। सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई में होने वाली सुनवाई में अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया में बदलाव के लिए कोई निर्देश जारी किए जाते हैं या नहीं।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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