बीकॉम के बाद छोड़ी शहर की नौकरी, अब फूलों की खेती से सालाना लाखों कमा रहे छतरपुर के चेतराम कुशवाहा व्यापार एक घंटा पहले 5
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के रहने वाले चेतराम कुशवाहा ने पारंपरिक खेती और नौकरी छोड़कर फूलों की खेती शुरू की, जिससे वे आज सालाना 3 लाख रुपये तक की कमाई कर रहे हैं।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के एक युवा ने यह साबित कर दिखाया है कि अगर सही दिशा में मेहनत की जाए, तो कृषि क्षेत्र में भी शानदार करियर बनाया जा सकता है। हम बात कर रहे हैं छतरपुर के बिलहरी गांव के चेतराम कुशवाहा की। चेतराम ने बीकॉम की पढ़ाई पूरी करने के बाद शहर का रुख किया और वहां नौकरी भी की। लेकिन शहर की नौकरी में उनका मन नहीं लगा और वह अपने गांव वापस लौट आए। उनके परिवार में पहले से ही पारंपरिक तरीके से खेती-किसानी होती थी, लेकिन चेतराम को खेती का वह पुराना ढर्रा पसंद नहीं आया। उन्होंने कुछ अलग करने की सोची और पारंपरिक फसलों को छोड़कर फूलों की खेती की ओर कदम बढ़ाया। आज वे महज 3 बीघा जमीन में फूलों की बागवानी करके सालाना लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं।

नौकरी और पारंपरिक खेती छोड़ क्यों चुनी फूलों की राह?

नौगांव क्षेत्र के बिलहरी गांव के निवासी चेतराम कुशवाहा ने साल 2015 से अपने खेतों में फूल उगाने की शुरुआत की थी। इससे पहले वे अपने खेतों में गेहूं, चना, मूंग और उड़द जैसी पारंपरिक फसलों की बुआई करते थे। चेतराम बताते हैं कि इन पारंपरिक फसलों में लागत और मेहनत तो बहुत लगती थी, लेकिन उस अनुपात में मुनाफा नहीं मिल पाता था। कभी मौसम की मार तो कभी बाजार के उतार-चढ़ाव के कारण उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ता था। इस समस्या से उबरने के लिए उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र नौगांव का रुख किया। वहां के विशेषज्ञों से उन्होंने फूलों की वैज्ञानिक खेती का बाकायदा प्रशिक्षण लिया। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद चेतराम का आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने बहुत ही छोटे स्तर पर फूलों की खेती करने का मन बनाया।

सिर्फ 150 पौधों से हुई थी शुरुआत

चेतराम कुशवाहा के फूलों की खेती के सफर की शुरुआत बेहद दिलचस्प है। उन्होंने सबसे पहले बड़े पैमाने पर काम शुरू नहीं किया, बल्कि परीक्षण के तौर पर केवल 150 गेंदे के पौधे लगाए। इन चुनिंदा पौधों की देखभाल करते हुए उन्हें जल्द ही सकारात्मक परिणाम दिखने लगे। चेतराम बताते हैं कि उन महज 150 गेंदे के पौधों से उन्हें हर हफ्ते करीब 200 रुपये की आमदनी होने लगी थी। इस शुरुआती और आसान सफलता ने उनके भीतर एक नया उत्साह भर दिया। उन्हें समझ आ गया कि इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की अपार संभावनाएं हैं। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी योजना का विस्तार करते हुए पूरे 3 बीघे क्षेत्र में फूलों की खेती शुरू कर दी।

चार अलग-अलग तरह के फूलों की खेती और जमीन की अदला-बदली

वर्तमान समय में चेतराम अपने 3 बीघा खेत में मुख्य रूप से चार प्रकार के फूलों की बागवानी कर रहे हैं। इनमें शामिल हैं:

  • गुलाब: इसकी खेती वे साल के बारहो महीने यानी पूरे वर्ष करते हैं।
  • गेंदा: इसकी खेती वे मौसम के हिसाब से यानी सीजनल तौर पर करते हैं।
  • बिजली: इसकी खेती भी सीजनल तौर पर की जाती है।
  • गैलार्डिया: इस फूल की खेती भी वे सीजन के अनुसार करते हैं।

फूलों की अच्छी पैदावार के लिए चेतराम एक विशेष तकनीक अपनाते हैं। वे हर बार एक ही जमीन पर एक ही तरह के फूल नहीं उगाते, बल्कि खेतों की अदला-बदली करते रहते हैं। उनका मानना है कि यदि एक ही खेत में लगातार एक ही किस्म के फूल उगाए जाएं, तो मिट्टी की उत्पादकता कम हो जाती है और पैदावार पर बुरा असर पड़ता है।

खेती की लागत और लाखों का मुनाफा

अगर इस पूरी खेती में आने वाली लागत और होने वाली कमाई के गणित को समझें, तो यह काफी मुनाफे का सौदा नजर आता है। चेतराम बताते हैं कि 3 बीघा जमीन में चारों तरह के फूलों की खेती करने में सालभर में कुल मिलाकर 70 हजार से 80 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इसमें वे अपनी खुद की शारीरिक मेहनत को शामिल नहीं करते हैं। लागत को और कम करने के लिए वे फूलों की नर्सरी खुद ही तैयार करते हैं, जिससे बाजार से महंगे पौधे खरीदने का खर्च बच जाता है।

कमाई की बात करें तो जहां पहले पारंपरिक फसलों से उन्हें सालभर में एक लाख रुपये की बचत भी मुश्किल से होती थी, वहीं अब इस फूलों की खेती से उन्हें सालाना करीब 3 लाख रुपये का सकल मुनाफा होता है। सभी खर्चे निकालने के बाद उन्हें सालभर में लगभग 2 लाख रुपये का शुद्ध लाभ आसानी से मिल जाता है। वे अपने फूलों को नजदीकी नौगांव शहर के बाजार में ही 80 रुपये से लेकर 120 रुपये प्रति किलोग्राम के भाव पर बेच देते हैं। फूलों की बिक्री से उन्हें हर रोज नकद कमाई होती है, जिससे दैनिक खर्चे आसानी से चलते हैं।

सब्जी की खेती में घाटा और फूलों में बंपर मुनाफा

चेतराम ने शहर की नौकरी छोड़ने के बाद सीधे फूलों की खेती शुरू नहीं की थी, बल्कि उन्होंने बीच में सब्जियों की खेती भी की थी। लेकिन सब्जियों की खेती का उनका अनुभव कुछ खास अच्छा नहीं रहा। वे बताते हैं कि सब्जियों की फसलों में कीड़े लगने की समस्या बहुत अधिक होती थी। फसलों को बचाने के लिए उन्हें सालभर महंगी कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करना पड़ता था। ये दवाएं बहुत महंगी होती थीं, जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ती चली गई। अत्यधिक मेहनत और भारी-भरकम लागत लगाने के बावजूद भी सब्जियों से मिलने वाला मुनाफा बेहद कम था। इसकी तुलना में फूलों की खेती में मेहनत काफी कम है और कीड़े-मकोड़ों का प्रकोप भी न के बराबर होता है, जिसके कारण दवाओं पर होने वाला खर्च बच जाता है और सीधे तौर पर मुनाफा बढ़ जाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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