सीतामढ़ी: दसवीं के छात्र रुद्र का कमाल, काई और सोलर ऊर्जा से बनाया किफायती एयर प्यूरीफायर बिहार 2 घंटे पहले 5
बिहार के सीतामढ़ी के रहने वाले छात्र रुद्र ने मात्र 2000 रुपये की लागत से एक अनोखा सोलर एयर प्यूरीफायर विकसित किया है। यह मशीन काई की मदद से हवा को शुद्ध करती है और बढ़ते प्रदूषण को कम करने में सक्षम है।

पर्यावरण संरक्षण की अनोखी पहल

बिहार के सीतामढ़ी जिले के एक दसवीं कक्षा के छात्र, रुद्र, ने प्रदूषण जैसी गंभीर समस्या का समाधान ढूंढ निकाला है। उन्होंने काई यानी एल्गी और सोलर ऊर्जा के मेल से एक बेहद अनूठा एयर प्यूरीफायर तैयार किया है। यह यंत्र न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि बेहद किफायती भी है। रुद्र का यह नवाचार उन महंगे प्यूरीफायर के सामने एक बड़ी चुनौती है जो बाजार में लाखों रुपये में मिलते हैं।

प्रदूषण से निपटने की प्रेरणा

रुद्र ने बताया कि पिछले एक से डेढ़ साल के दौरान उन्होंने सीतामढ़ी में तापमान और उमस में भारी बढ़ोतरी महसूस की है। इसके साथ ही गिरते भूजल स्तर ने उन्हें चिंता में डाल दिया। शोध करने पर उन्होंने पाया कि इन समस्याओं के पीछे ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस गैसों की अत्यधिक मात्रा मुख्य कारण है। उन्होंने देखा कि स्थानीय स्तर पर गाड़ियों से निकलने वाले धुएं और पास की मिल्क फैक्ट्री जैसे औद्योगिक स्रोतों से प्रदूषण लगातार फैल रहा है। रुद्र ने महसूस किया कि बाजार में उपलब्ध बड़े प्यूरीफायर प्लांट न केवल करोड़ों रुपये के आते हैं, बल्कि उन्हें चलाने के लिए बड़ी जगह और कोयले से बनी बिजली की आवश्यकता होती है। उन्होंने कहा कि बिजली की इस मांग से प्रदूषण कम होने के बजाय और अधिक बढ़ता है।

यंत्र की कार्यप्रणाली और तकनीक

रुद्र ने एक ऐसा मॉडल तैयार किया है जो पूरी तरह से सोलर पावर पर आधारित है। इस प्यूरीफायर की कार्यप्रणाली को समझने के लिए इसे समझना जरूरी है:

  • इसमें लगे गैस सेंसर लगातार वातावरण में गैसों के स्तर को मॉनिटर करते हैं।
  • जब हवा में प्रदूषण का स्तर सामान्य से अधिक हो जाता है, तो एग्जॉस्ट फैन सक्रिय हो जाता है और दूषित हवा को अंदर खींच लेता है।
  • हवा प्यूरीफायर के अंदर जाकर सबसे पहले गंदगी से मुक्त होती है।
  • इसके बाद यह हवा केमिकल चैंबरों से गुजरती है, जहां ग्रीनहाउस गैसों का ब्रेकडाउन किया जाता है।
  • अंत में, हवा कार्बन डाइऑक्साइड एल्गी यानी काई सॉल्यूशन चैंबर में जाती है। यहाँ फोटोसिंथेसिस यानी प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के जरिए काई कार्बन डाइऑक्साइड को सोख लेती है और ऑक्सीजन उत्सर्जित करती है।
  • इस प्रक्रिया से कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें भी पूरी तरह समाप्त हो जाती हैं।

रखरखाव और बायोफ्यूल का विकल्प

आम तौर पर लोगों को लगता है कि काई आधारित यंत्रों को बहुत अधिक देखरेख की जरूरत होती है, लेकिन रुद्र ने स्पष्ट किया कि इसका रखरखाव बेहद आसान है। इस यंत्र को केवल हर चार साल में एक बार खोलकर साफ करने की आवश्यकता होती है। जब काई रीप्रोड्यूस होकर अपनी संख्या बढ़ा लेती है, तो यह खुद ही दूसरे चैंबर में स्थानांतरित हो जाती है और बायोफ्यूल यानी जैव ईंधन में बदल जाती है। इससे यह सिस्टम लंबे समय तक बिना किसी बड़ी समस्या के काम कर सकता है और जरूरत पड़ने पर बायोफ्यूल के जरिए भी संचालित किया जा सकता है।

लागत और प्रभावशीलता

रुद्र ने इस डिवाइस की लागत पर जोर देते हुए बताया कि एक यूनिट को तैयार करने में लगभग 2000 से 2200 रुपये का खर्च आता है। इसके परिणामों की बात करें तो उन्होंने परीक्षण के दौरान देखा कि एक स्थान पर जहां AQI 223 था, वहां इस छोटे से यंत्र ने महज एक घंटे के भीतर इसे घटाकर 143 कर दिया। यह कॉम्पैक्ट मॉडल लगभग 70 फीट के दायरे में मौजूद हवा को प्रभावी ढंग से साफ करने में सक्षम है। भविष्य की योजनाओं पर बात करते हुए रुद्र ने कहा कि वे इस पर और अधिक रिसर्च कर रहे हैं। जल्द ही वे सीतामढ़ी के अलग-अलग हिस्सों में इसके 4-5 मॉडल लगाकर उसका परीक्षण करेंगे। यदि उन्हें अपने परिवार और प्रशासन का उचित सहयोग मिलता है, तो वे इसे बड़े स्तर पर लॉन्च करने का प्रयास करेंगे।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप