चीन
4 घंटे पहले
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चीन में मिली डायनासोर की नई प्रजाति
दुनियाभर के जीवाश्म वैज्ञानिकों के लिए एक नई खोज चर्चा का विषय बनी हुई है। चीन में वैज्ञानिकों को एक ऐसे जीव का लगभग पूर्ण कंकाल प्राप्त हुआ है जो देखने में किसी पंखों वाले विशाल भालू जैसा लगता है। इस डायनासोर को शोधकर्ताओं ने कायरासॉरस चांगलियेंसिस नाम दिया है। यह जीव अर्ली क्रिटेशियस काल का एक थेरिज़िनोसॉर है। इसका कंकाल पश्चिमी लियाओनिंग प्रांत में स्थित यिक्सियन फॉर्मेशन से निकाला गया है। इस खोज ने प्राचीन जीवों के इतिहास को समझने की दिशा में नई जानकारी प्रदान की है।
कायरासॉरस का शारीरिक स्वरूप
यह जीव दो पैरों पर चलने वाला प्राणी था, जिसकी लंबाई लगभग 11.8 फीट मापी गई है। यह रिकॉर्ड अब तक इस प्रजाति के मिलने वाले जीवाश्मों में सबसे बड़ा है। इसकी शारीरिक संरचना काफी अनोखी है। इसका शरीर घने पंखों से ढका हुआ था, जिससे यह किसी भारी-भरकम भालू की तरह नजर आता था। इसके अलावा इसके पेट का हिस्सा मटके की तरह बाहर निकला हुआ था। इसकी गर्दन लंबी थी और हाथों में बेहद विशाल व डरावने पंजे लगे हुए थे। हालांकि इसका रूप किसी खूंखार शिकारी जैसा प्रतीत होता है, लेकिन अध्ययन बताते हैं कि यह मुख्य रूप से पेड़-पौधों पर निर्भर रहने वाला शाकाहारी जीव था। यह अपने पंजों का इस्तेमाल ऊंची डालियों को पकड़ने और पत्तियां तोड़ने के लिए करता था।
77 दांतों वाला जबड़ा और वैज्ञानिक रहस्य
जर्नल ऑफ सिस्टमैटिक पेलियोन्टोलॉजी में प्रकाशित शोध इस जीव के जबड़ों के बारे में चौंकाने वाली जानकारी साझा करता है। इस डायनासोर के ऊपरी जबड़े में 32 से अधिक और निचले जबड़े में 45 से अधिक दांत मौजूद थे। कुल मिलाकर इसके जबड़े में 77 से ज्यादा बेहद बारीक और घने दांत थे। वैज्ञानिकों के लिए यह बनावट काफी विचित्र है क्योंकि ये दांत अन्य डायनासोर की तुलना में असामान्य रूप से छोटे और एक-दूसरे से पूरी तरह सटे हुए थे। इसके अलावा, इसके थूथन के पास ऊपरी जबड़े में एक अजीब सा छेद मिला है और नाक की हड्डी आंखों के कोटरों तक फैली हुई थी, जो आगे जाकर दो हिस्सों में विभाजित होती है। इस तरह की शारीरिक विशेषता किसी अन्य थेरिज़िनोसॉर में पहले कभी नहीं देखी गई थी।
अपने समूह का सबसे बड़ा जीव
कायरासॉरस चांगलियेंसिस का वजन 117 किलोग्राम से लेकर 274 किलोग्राम के बीच अनुमानित किया गया है। चूंकि मिला हुआ कंकाल पूरी तरह वयस्क अवस्था का नहीं था, इसलिए वैज्ञानिकों का मानना है कि अपनी पूर्ण उम्र में यह जीव इससे भी अधिक भारी रहा होगा। यह खोज जेहोल बायोटा इकोसिस्टम के लिए एक बड़ी उपलब्धि है क्योंकि यह वहां मिला अब तक का सबसे बड़ा थेरिज़िनोसॉर है। इसने पिछले रिकॉर्ड होल्डर बेइपियाओसॉरस को काफी पीछे छोड़ दिया है, जो आकार में कायरासॉरस से कम से कम 1.6 गुना छोटा था।
चबाने की अद्वितीय क्षमता
रिसर्च टीम के अनुसार, जेहोल बायोटा के इलाके में अलग-अलग तरह के थेरिज़िनोसॉर निवास करते थे। जियानचांगोसॉरस जैसे जीव पतले और तेज दौड़ने में सक्षम थे, जबकि कायरासॉरस जैसे जीव अपनी भारी काया के कारण बहुत तेज गति से नहीं दौड़ पाते थे। हालांकि, उनकी ताकत उनके जबड़ों में छिपी थी। इनके जबड़े की बनावट यह दर्शाती है कि वे कठोर वनस्पति को भी आसानी से चबाकर पीसने में माहिर थे। इनकी काटने की क्षमता अन्य प्रजातियों की तुलना में अत्यधिक विकसित थी।
पंजों का अनसुलझा रहस्य
इस डायनासोर की गर्दन की हड्डियां उसकी पीठ की हड्डियों की तुलना में काफी लंबी थीं, जो इसे एक अलग रूप प्रदान करती थीं। इसके साथ ही, इसके हाथ के पंजों पर ऊपरी तरफ एक विशिष्ट उभार देखा गया है। पेलियोन्टोलॉजिस्ट्स के मुताबिक, ऐसा शारीरिक उभार किसी भी अन्य थेरिज़िनोसॉर में दर्ज नहीं किया गया है, जो इस खोज को और अधिक रहस्यमयी बनाता है। हालांकि, कंकाल में पिछले पैरों की हड्डियां गायब थीं, जिसके कारण इसके चलने के तरीके और सटीक वजन पर अभी भी कुछ सीमाएं बनी हुई हैं। इसकी खोपड़ी भी काफी दबी हुई स्थिति में मिली है। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में और अधिक जीवाश्म मिलने पर इस रहस्यमयी शैतान के जीवन से जुड़े अन्य पहलू और स्पष्ट हो सकेंगे। यह खोज डायनासोरों के विकासवादी इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय साबित हो रही है।
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