मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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पुलिस थाने के भीतर रावण का वास
पूरे भारत में विजयदशमी का दिन बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन हर जगह रावण के पुतले जलाए जाते हैं और लोग खुशी मनाते हैं। लेकिन मध्य प्रदेश के सतना जिले में एक ऐसी जगह है, जहां परंपराएं बिल्कुल अलग हैं। सतना के कोठी पुलिस थाने के परिसर में एक ऐसी प्रतिमा स्थापित है, जिसे जलाने के बजाय पूजा जाता है। यह प्रतिमा रावण की है, जिसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां की पुलिस खुद उठाती है। कोठी थाना परिसर में स्थित यह मूर्ति लगभग 25 फुट ऊंची और 22 फुट चौड़ी है। इसकी खासियत यह है कि यह कम से कम 300 साल पुरानी मानी जाती है।
9 सिरों वाली रावण की प्रतिमा का रहस्य
सामान्य तौर पर रावण को 10 सिरों के साथ दर्शाया जाता है, लेकिन कोठी थाने में स्थित यह प्रतिमा काफी अनूठी है क्योंकि इसमें रावण के केवल 9 सिर हैं। स्थानीय लोक मान्यताओं और श्रद्धालुओं का मानना है कि रावण ने अपना एक सिर भगवान शिव को समर्पित कर दिया था, जिसके बाद से ही यह नौ सिरों वाली आकृति अस्तित्व में आई। हालांकि यह मूर्ति कोठी थाने के निर्माण से सदियों पुरानी है, लेकिन करीब 19 साल पहले जब इस थाने का नया भवन बना, तब से यह मूर्ति थाना परिसर की सुरक्षा घेरे के अंदर आ गई। अब इसी वजह से पुलिसकर्मी दशहरे के मौके पर इस ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं ताकि किसी तरह का कोई नुकसान न हो।
राजपुरोहित परिवार की चौथी पीढ़ी निभा रही परंपरा
इस प्रतिमा की पूजा-अर्चना करने वाले पुजारी रमेश मिश्रा ने बताया कि उनके परिवार का इस मूर्ति से गहरा नाता है। 56 वर्षीय रमेश मिश्रा का कहना है कि यह प्रतिमा स्थानीय शासकों द्वारा करीब 300 साल पहले स्थापित कराई गई थी। उनके पूर्वज कोठी रियासत के राजाओं के दरबार में राजपुरोहित का कार्य करते थे और तब से ही उनका परिवार इस परंपरा को बखूबी निभा रहा है। पुजारी रमेश मिश्रा ने बताया कि उन्हें अपने परिवार की चार पीढ़ियों का स्मरण है, जिन्होंने दशहरा के अवसर पर यहां विधि-विधान से पूजा की है। उनके पिता, दादा और परदादा ने इसी परंपरा का निर्वहन किया था और अब वे इसे पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
रामलीला और लोककथाओं से जुड़ा इतिहास
यह स्थान रामायण काल की कई कहानियों और लोक मान्यताओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। पुजारी रमेश मिश्रा के अनुसार, पुराने समय में इस प्रतिमा के पास से एक छोटी नदी बहा करती थी, जिसके दूसरे किनारे पर एक 'राम चबूतरा' बना हुआ था। कोठी के तत्कालीन शासक वहां भव्य रामलीला का आयोजन किया करते थे। उस समय भगवान राम की भूमिका निभाने वाले कलाकार नदी के दूसरी तरफ से रावण की इस प्रतिमा की ओर प्रतीकात्मक रूप से तीर चलाते थे। उस दौरान नदी पर बना एक पुल 'राम सेतु' के रूप में माना जाता था, जबकि रावण की मूर्ति वाली भूमि को स्थानीय लोग 'लंका' का दर्जा देते थे।
चित्रकूट से जुड़ा है रावण का इतिहास
रमेश मिश्रा ने एक और स्थानीय किंवदंती का जिक्र किया, जिसके अनुसार रावण ने उस समय जंगल की सीमाओं पर अपने गुप्तचर तैनात कर रखे थे, जहां भगवान राम ने चित्रकूट में अपने वनवास का एक लंबा हिस्सा बिताया था। उनका कहना है कि इस इलाके का महत्व रामायण की घटनाओं से सीधे तौर पर जुड़ा है। केवल सतना ही नहीं, बल्कि उमरिया जिले के चित्रकूट और पाली जैसे इलाकों में भी रावण की ऐसी प्राचीन मूर्तियां मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र की धार्मिक और ऐतिहासिक विशिष्टता को दर्शाती हैं।
दशहरे पर होती है विशेष पूजा
इस साल 20 अक्टूबर को दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है और इस अवसर पर रमेश मिश्रा और उनका पूरा परिवार एक बार फिर इस प्रतिमा के सामने विशेष पूजा-अर्चना करेगा। एक पुलिस थाने के भीतर रावण की प्रतिमा का होना और पुलिस द्वारा उसकी सुरक्षा करना अपने आप में एक बेहद दिलचस्प और अनोखा दृश्य प्रस्तुत करता है। जहां बाकी दुनिया रावण को बुराई का प्रतीक मानकर पुतले जलाती है, वहीं कोठी के लोग अपनी इस 300 साल पुरानी सांस्कृतिक विरासत को सहेज कर रखे हुए हैं।
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