24 साल की उम्र में देश के लिए शहीद हुए फ्लाइट लेफ्टिनेंट मनु अखौरी, 1500 मासूमों की बचाई थी जान झारखंड 2 घंटे पहले 3
भारतीय वायुसेना के वीर सपूत फ्लाइट लेफ्टिनेंट मनु अखौरी ने साल 2009 में एक विमान दुर्घटना के दौरान अदम्य साहस दिखाते हुए 1500 बच्चों और नागरिकों की जान बचाई थी। अपनी जान की परवाह न करते हुए उन्होंने मिग-21 को आबादी से दूर ले जाकर क्रैश कराया था।

वीरता की एक अमर दास्तान

भारतीय वायुसेना के साहसी योद्धा फ्लाइट लेफ्टिनेंट मनु अखौरी की शहादत को आज भी देश नमन करता है। महज 24 साल की युवा अवस्था में उन्होंने कर्तव्य की वेदी पर अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दे दिया था। यह घटना 10 सितंबर 2009 की है, जब पंजाब के भटिंडा एयरफोर्स स्टेशन से उड़ान भरने के दौरान उनके मिग-21 विमान में गंभीर तकनीकी खराबी आ गई थी। उस कठिन घड़ी में उन्होंने अपनी जान बचाने के बजाय जमीन पर मौजूद 1500 बच्चों और आम नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी और विमान को घनी आबादी वाले क्षेत्र से सुरक्षित बाहर ले जाकर वीरगति प्राप्त की।

सपनों की उड़ान और पारिवारिक पृष्ठभूमि

शहीद मनु अखौरी का जन्म 21 फरवरी 1984 को हुआ था। उनके पिता कर्नल संजय अखौरी ने भारतीय सेना में वर्ष 1976 से लेकर 2013 तक अपनी सेवाएं दी थीं। उनकी माता नीरा अखौरी के लाडले मनु बचपन से ही आसमान की ऊंचाइयों को छूने का सपना देखते थे। मेदिनीनगर के रहने वाले मनु ने अपनी शुरुआती पढ़ाई स्थानीय सेक्रेड हार्ट स्कूल से पूरी की। वर्ष 2002 में बारहवीं की कक्षा पास करने के बाद, उन्होंने अपने लक्ष्य को पाने के लिए एनडीए की तैयारी शुरू की। विमान और विशेष रूप से लड़ाकू विमानों के प्रति उनका आकर्षण उन्हें इस क्षेत्र में खींच लाया था।

संघर्ष और भारतीय वायुसेना में चयन

मनु के पिता कर्नल संजय अखौरी बताते हैं कि उनके बेटे की राह आसान नहीं थी। उन्होंने बताया कि एनडीए की परीक्षाओं के दौरान उनका चयन पहले आर्मी और बाद में नेवी के लिए हो गया था, लेकिन मनु का ध्येय केवल भारतीय वायुसेना में शामिल होना था। अंततः 2003 में उनका चयन वायुसेना के लिए हुआ। उन्होंने कठोर प्रशिक्षण पूरा किया और वर्ष 2006 में उन्हें कमीशन मिला। बेहतर प्रदर्शन के चलते वे आगे की ट्रेनिंग के लिए कर्नाटक के बीदर गए। इसके बाद आधुनिक हॉक विमान के प्रशिक्षण के लिए उन्हें वर्ष 2008 में इंग्लैंड भी भेजा गया। अपना प्रशिक्षण सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद, 2009 में उनकी तैनाती भटिंडा एयरफोर्स स्टेशन की 17 स्क्वाड्रन में हुई थी।

वह आखिरी उड़ान और अदम्य साहस

कर्नल संजय अखौरी के अनुसार, 10 सितंबर 2009 की सुबह मनु एक निर्धारित उड़ान अभ्यास के लिए निकले थे। उन्होंने विमान का पहला सर्किट बहुत ही कुशलता के साथ पूरा किया। इसके बाद उन्हें दूसरे सर्किट के लिए निर्देश दिए गए। उड़ान के दौरान अचानक मिग-21 में तकनीकी खराबी आ गई और विमान का नियंत्रण बिगड़ने लगा। मनु ने तुरंत एयर ट्रैफिक कंट्रोल को स्थिति से अवगत कराया। उस समय विमान के ठीक नीचे एक आबादी वाला क्षेत्र था, जिसमें एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल स्थित था। उस स्कूल में करीब 1500 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। इसके अलावा पास में एक पेट्रोल पंप और व्यस्त सड़क भी थी।

कर्तव्य की खातिर अपनी जान की आहुति

मनु अखौरी के पास खुद को इजेक्ट कर अपनी जान बचाने का मौका था, लेकिन उन्होंने ऐसा करना उचित नहीं समझा। उन्होंने पूरी एकाग्रता के साथ विमान को स्कूल और पेट्रोल पंप की दिशा से मोड़ने का साहसिक प्रयास किया। वे लगातार विमान को आबादी से दूर ले जाने की जद्दोजहद करते रहे। अंततः, विमान पंजाब के मुक्तसर जिले के भलाइयाना गांव के पास एक सुनसान क्षेत्र में जा गिरा। इस दर्दनाक दुर्घटना में देश ने अपना एक युवा जांबाज पायलट खो दिया, लेकिन उनकी इस बहादुरी ने सैकड़ों परिवारों को उजड़ने से बचा लिया।

पिता को मिली दुखद सूचना

कर्नल संजय अखौरी ने उस पल को याद करते हुए बताया कि वे उस समय ट्रेन में यात्रा कर रहे थे और अपने बेटे से मिलने भटिंडा जा रहे थे। तभी उन्हें एक साथी का फोन आया और मिग-21 दुर्घटना की भयावह जानकारी मिली। जब उन्हें पता चला कि विमान के पायलट उनके अपने पुत्र मनु अखौरी थे, तो उन पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। हालांकि, एक फौजी पिता के तौर पर उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके बेटे ने अपने अंतिम समय में भी कर्तव्य और मानवता का धर्म निभाया।

श्रद्धांजलि और यादें

आज भी मनु अखौरी की शहादत की यादें लोगों के जहन में ताजा हैं। भलाइयाना गांव में उस स्थान को उनके नाम से जोड़ने की पहल की गई है। मेदिनीनगर में भी उनकी शहादत के सम्मान में सद्दीक चौक से इंजीनियरिंग रोड की ओर जाने वाली सड़क का नाम 'मनु अखौरी सड़क' रखा गया है। हर साल 10 सितंबर को उनकी पुण्यतिथि पर पूर्व सैनिक, सामाजिक कार्यकर्ता और गणमान्य लोग एकत्र होकर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि देते हैं। महज 24 वर्ष की उम्र में दिखाया गया उनका अदम्य साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रेरणा का एक अटूट स्रोत बना रहेगा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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