खैबर पख्तूनख्वा में गवर्नर शासन पर मचा बवाल, शहबाज सरकार के फैसले के खिलाफ अदालत पहुंची पीटीआई विश्व 5 घंटे पहले 2
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में इमरजेंसी और गवर्नर शासन लागू होने से राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इमरान खान की पार्टी पीटीआई ने इसे लोकतंत्र पर प्रहार बताते हुए कानूनी लड़ाई छेड़ने का ऐलान किया है।

खैबर पख्तूनख्वा में सियासी पारा गर्म

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में गवर्नर शासन लागू होने के बाद से ही राजनीतिक माहौल काफी गर्मा गया है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की अगुवाई वाली संघीय सरकार ने राज्य में बिगड़ती सुरक्षा व्यवस्था और आतंकवाद की चुनौतियों का हवाला देते हुए यह बड़ा कदम उठाया है। हालांकि, पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ यानी PTI ने इस फैसले को जनता के जनादेश का अपमान और प्रांतीय स्वायत्तता पर एक सुनियोजित हमला करार दिया है। इस फैसले के विरोध में पार्टी ने अब अदालत का दरवाजा खटखटाने का मन बना लिया है।

घटनाक्रम और सरकारी निर्णय

इस पूरे मामले की शुरुआत 11 अक्टूबर को हुई, जब पाकिस्तान की संघीय सरकार ने खैबर पख्तूनख्वा में इमरजेंसी और गवर्नर शासन को लागू करने का औपचारिक फैसला लिया। राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने संघीय कैबिनेट की सिफारिशों पर मुहर लगा दी, जिसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी के नेतृत्व वाली पीटीआई सरकार की सभी संवैधानिक शक्तियां निष्प्रभावी हो गईं। वर्तमान में, पूरे प्रांत का प्रशासनिक नियंत्रण गवर्नर फैसल करीम कुंडी के हाथों में आ गया है।

आतंकवाद और सुरक्षा का मुद्दा

शहबाज शरीफ सरकार का तर्क है कि खैबर पख्तूनख्वा की प्रांतीय सरकार आतंकवाद के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियानों में संघीय प्रशासन का सहयोग नहीं कर रही थी। संघीय सरकार ने पीटीआई प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि वे अफगान तालिबान के साथ बातचीत के मामले में एक ऐसा रुख अपना रहे थे, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों से मेल नहीं खाता। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, प्रांत के 12 जिलों में स्थिति बहुत चिंताजनक बनी हुई है, जहां कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अब नागरिक प्रशासन के साथ सेना की तैनाती को भी अधिकृत कर दिया गया है।

संविधान का उल्लंघन और पीटीआई का रुख

पीटीआई ने इसे पूरी तरह असंवैधानिक कदम बताया है। पार्टी अध्यक्ष बैरिस्टर गोहर अली खान के अनुसार, शांति बहाली का बहाना बनाकर जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सत्ता से बेदखल करना लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है। पार्टी इस मामले को लेकर संसद से लेकर सड़क और अदालत तक संघर्ष करने की तैयारी में है। पीटीआई ने स्पष्ट किया है कि वे इस फैसले को चुनौती देने के लिए पेशावर हाई कोर्ट में याचिका दायर करेंगे।

इमरान खान की रिहाई और विरोध मार्च

इस सियासी तनाव के बीच पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई को लेकर पीटीआई का विरोध प्रदर्शन लगातार जारी है। पार्टी इस राजनीतिक संघर्ष को अपने नेता की रिहाई के साथ जोड़कर देख रही है। इस प्रदर्शन के दौरान कई स्थानों पर प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा एजेंसियों के बीच टकराव की खबरें सामने आई हैं। कुछ इलाकों से गोलीबारी होने की भी जानकारी मिली है, हालांकि इसकी आधिकारिक और स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है। पार्टी के महासचिव सलमान अकरम राजा ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री सोहेल अफरीदी समेत पीटीआई के कई शीर्ष नेताओं को हिरासत में ले लिया गया है और उन्हें उनके स्थान की जानकारी नहीं मिल पा रही है। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, प्रदर्शन के पहले दिन लगभग 278 पीटीआई कार्यकर्ताओं और सदस्यों को हिरासत में लिया गया है।

विपक्षी दलों और बार काउंसिल का विरोध

गवर्नर शासन के इस फैसले का विरोध सिर्फ पीटीआई तक सीमित नहीं है। 'तहरीक-ए-तहफ्फुज-ए-आइन-ए-पाकिस्तान' गठबंधन ने इस कदम को सीधे तौर पर संविधान का उल्लंघन माना है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम-फजल (JUI-F) ने भी इस कार्रवाई की कड़ी निंदा की है। विपक्षी नेताओं ने सरकार से तीखा सवाल किया है कि यदि सुरक्षा की स्थिति इतनी ही नाजुक है, तो बलूचिस्तान जैसे अशांत प्रांत में ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं की गई। इसके अलावा, खैबर पख्तूनख्वा बार काउंसिल ने भी संवैधानिक संकट पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अदालतों में हड़ताल का आह्वान किया है।

भविष्य की चुनौतियां और संसद की भूमिका

आने वाले समय में यह विवाद कानूनी और राजनीतिक रूप से और गहराने की संभावना है। पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 232 के अंतर्गत, यदि किसी प्रांत में विधानसभा के प्रस्ताव के बिना इमरजेंसी लागू की जाती है, तो उसे संसद के दोनों सदनों से 10 दिनों के भीतर पारित कराना अनिवार्य होता है। इसके साथ ही, पेशावर हाई कोर्ट की सुनवाई और पीटीआई की अगली रणनीतियों पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

अंतरराष्ट्रीय और मानवीय दृष्टिकोण

इस मामले पर एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी प्रतिक्रिया दी है। संस्था ने चेताया है कि इमरजेंसी का उपयोग मानवाधिकारों के हनन, विरोध की आवाज दबाने या मनमानी गिरफ्तारियों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। इंटरनेट सेवाओं को बंद करने और कानून-व्यवस्था के लिए सेना को अधिकृत करने जैसे फैसलों पर भी सवाल उठाए गए हैं। स्पष्ट है कि खैबर पख्तूनख्वा में लिया गया यह निर्णय पाकिस्तान में सुरक्षा बनाम लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच चल रही बहस को नई दिशा देगा, जिसका असर आने वाले कुछ हफ्तों में साफ दिखाई देगा।

साहिल चौहान पाबना के वर्ल्ड अफेयर्स रिपोर्टर हैं, जो अंतरराष्ट्रीय खबरें और वैश्विक मामले कवर करते हैं। विदेश नीति, कूटनीति और दुनिया भर के घटनाक्रमों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे जटिल वैश्विक मुद्दों को भारतीय नजरिए से समझाते हैं।

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