छत्तीसगढ़
3 घंटे पहले
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बस्तर के किसानों के लिए बड़ी चुनौती
बस्तर अंचल में इन दिनों धान की खेती अपने महत्वपूर्ण चरण में है और खेतों में फसल की बालियां निकल रही हैं। हालांकि, इस समय किसानों के सामने गॉल मिज कीट का बड़ा खतरा खड़ा हो गया है। यह समस्या फसल को भीतर से खोखला कर देती है, जिससे बालियों का विकास रुक जाता है और उत्पादन में भारी कमी देखने को मिलती है। स्थानीय स्तर पर किसान इसे मोंगा, पोंगली या गंगई के नाम से जानते हैं। कीट विशेषज्ञ धरमपाल केरकेट्टा के अनुसार, खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान है और बस्तर में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है, लेकिन वर्तमान में यह कीट किसानों की चिंता का मुख्य कारण बना हुआ है।
गॉल मिज की पहचान कैसे करें
कीट विशेषज्ञ केरकेट्टा का कहना है कि किसान अपने खेतों में जाकर बेहद आसानी से इस कीट के संक्रमण की जांच कर सकते हैं। जब धान के पौधे पर गॉल मिज का आक्रमण होता है, तो उसका स्वरूप पूरी तरह से बदल जाता है। संक्रमित पौधा बिल्कुल प्याज के पौधे जैसा दिखने लगता है। यह इस कीट का सबसे प्रमुख लक्षण है। यदि किसान को खेत में ऐसे पौधे दिखाई दें, तो उन्हें तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। यदि इस बीमारी पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यह पूरी फसल को नष्ट कर सकती है। इस कीट के प्रभाव से धान की बालियां पूरी तरह नहीं निकल पाती हैं, जिससे पैदावार में 100 प्रतिशत तक का नुकसान होने की आशंका रहती है।
फसल को बचाने के तरीके
कीट विशेषज्ञ ने इस समस्या के नियंत्रण के लिए कई महत्वपूर्ण सलाह दी हैं। इस वर्ष वर्षा की कमी देखी गई है, लेकिन फिर भी किसानों को खेत में अतिरिक्त जलभराव की स्थिति बनने पर उसे बाहर निकाल देना चाहिए, क्योंकि यह कीट के जीवन चक्र को और अधिक बढ़ावा देता है। खेत के आसपास की मेड़ों की साफ-सफाई रखना भी बहुत जरूरी है। इसके अलावा, खेत में अत्यधिक यूरिया के प्रयोग से बचना चाहिए। किसानों को सलाह दी गई है कि वे खाद का इस्तेमाल केवल निर्धारित मात्रा में ही करें ताकि फसल की प्रतिरोधक क्षमता बनी रहे।
रासायनिक उपचार की विधि
गॉल मिज के प्रकोप से निपटने के लिए विशेषज्ञ ने रासायनिक दवाओं के सही उपयोग का सुझाव दिया है। किसान भाई निम्नलिखित विकल्पों पर गौर कर सकते हैं:
- फिप्रोनिल: इसके उपयोग के लिए 10 किलो प्रति एकड़ की दर से दानेदार रूप में इसका प्रयोग किया जा सकता है।
- छिड़काव विधि: यदि किसान छिड़काव करना चाहते हैं, तो 500 मिलीलीटर प्रति एकड़ की मात्रा का उपयोग करना उचित होगा।
- थायामेथोक्साम: यह भी एक प्रभावी विकल्प है जो दानेदार रूप में उपलब्ध है। इसके लिए 40 ग्राम प्रति एकड़ की मात्रा में घोल तैयार करके छिड़काव किया जा सकता है।
यदि खेत में संक्रमण का स्तर बहुत अधिक है, तो किसान पूरे खेत में 8 से 10 टंकी स्प्रे करने की योजना बना सकते हैं। समय रहते उठाए गए ये कदम धान की फसल को पूरी तरह बर्बाद होने से बचा सकते हैं और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से राहत मिल सकती है।
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