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एक घंटा पहले
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कन्या पूजन की सही तारीख को लेकर संशय
शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान अष्टमी और नवमी तिथि का विशेष महत्व होता है। इस वर्ष कन्या पूजन की तारीख को लेकर श्रद्धालुओं में थोड़ी दुविधा देखी जा रही है कि पूजा 18 अक्टूबर को की जाए या फिर 19 अक्टूबर को। हिंदू धर्म और ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में कन्याओं का पूजन मां दुर्गा के साक्षात स्वरूप की सेवा करने के समान माना जाता है। इस बार तिथियों की गणना और उदय काल के आधार पर पूजन का समय निर्धारित करना महत्वपूर्ण हो गया है।
पूजन का सही समय और तिथि का गणित
पंडित शिप्रा सचदेव के अनुसार, कन्या पूजन की विधि अलग-अलग परंपराओं के अनुसार तय की जाती है। कहीं पर सप्तमी के दिन व्रत रखा जाता है और अष्टमी को कन्या पूजन संपन्न होता है। इस वर्ष महासप्तमी की तिथि 17 अक्टूबर और 18 अक्टूबर दोनों दिन प्रभावी है। 17 अक्टूबर को पूरे दिन सप्तमी तिथि बनी रहेगी, जबकि 18 अक्टूबर को दिन में 11.36 बजे से महाअष्टमी की शुरुआत हो जाएगी।
जो श्रद्धालु इसके अनुसार चलना चाहते हैं, वे 17 अक्टूबर को उपवास रख सकते हैं और 18 अक्टूबर को 11.36 बजे के बाद कन्या पूजन कर सकते हैं। इसके अलावा, जो भक्त पूरे दिन व्रत का पालन करना चाहते हैं, वे 18 अक्टूबर को पूरे दिन उपवास रखकर 19 अक्टूबर को कन्या पूजन कर सकते हैं। 19 अक्टूबर, सोमवार को सुबह 7.36 बजे से नवमी तिथि का प्रारंभ हो जाएगा। उदया तिथि की गणना के आधार पर 19 अक्टूबर को अष्टमी और नवमी दोनों का योग बन रहा है, जो कन्या पूजन के लिए शुभ माना जाता है।
शुक्र ग्रह को मजबूत करने के विशेष उपाय
ज्योतिष शास्त्र में नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन को शुक्र ग्रह की स्थिति सुधारने का एक बड़ा माध्यम माना गया है। पंडित शिप्रा सचदेव का कहना है कि वर्तमान में शुक्र अस्त चल रहे हैं, जिसका असर अक्सर व्यक्ति की आर्थिक स्थिति और सुख-संपदा पर पड़ता है। ऐसे में यदि कन्या पूजन के दौरान कन्याओं को सुहाग से जुड़ी सामग्री या फैशन से संबंधित उपहार दिए जाएं, तो शुक्र देव की कृपा प्राप्त होती है और धन वैभव में वृद्धि होती है। आप कन्याओं को रबर, क्लेचर या परफ्यूम जैसी वस्तुएं भेंट कर सकते हैं। ये छोटी-छोटी भेंट न केवल कन्याओं को प्रसन्न करेंगी, बल्कि कुंडली में शुक्र के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने में भी सहायक सिद्ध होंगी।
कन्या पूजन का धार्मिक महत्व
नवरात्रि के दौरान कन्या पूजन, जिसे आमतौर पर कंजक पूजन भी कहा जाता है, बेहद फलदायी माना गया है। मान्यता है कि छोटी कन्याओं में साक्षात मां दुर्गा के नौ स्वरूपों का वास होता है। इसीलिए अष्टमी और नवमी के दिन इन देवियों की पूजा करके भक्त मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। जब भक्त सच्चे मन से इन कन्याओं को देवी मानकर उनकी सेवा करते हैं, तो घर में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। यह परंपरा भक्तों को अहंकार त्यागकर सेवा भाव सिखाने का भी एक माध्यम है।
कन्या पूजन के दौरान इन 6 बातों का रखें विशेष ध्यान
शास्त्र-सम्मत नियमों के अनुसार, कन्या पूजन करते समय कुछ बुनियादी बातों का पालन करना आवश्यक है ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके:
- आयु सीमा का ध्यान: कन्या पूजन के लिए सामान्यतः 2 से 10 वर्ष तक की आयु की कन्याओं को ही आमंत्रित करना सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
- आदरपूर्ण स्वागत: घर आने वाली हर कन्या का पूरी श्रद्धा के साथ स्वागत करें, उनके चरणों को स्वच्छ जल से धोएं और माथे पर तिलक लगाकर उनका सम्मान करें।
- भोजन का प्रसाद: पूजन के बाद कन्याओं को सात्विक भोजन कराएं। इसमें हलवा, पूरी और काले चने का प्रसाद विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
- समान व्यवहार: भोजन कराते समय किसी भी बच्ची के साथ कोई भेदभाव न करें। सभी को एक समान स्नेह और आदर के साथ भोजन परोसें।
- सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा: कन्याओं को भोजन कराने के बाद अपनी सामर्थ्य और श्रद्धा के अनुसार कुछ दक्षिणा जरूर दें।
- उपहार और सम्मान: कन्याओं की पसंद और उनकी खुशी का पूरा ध्यान रखें। उन्हें जो भी उपहार दें, वह सम्मान के साथ दें ताकि उनकी इच्छा का मान बना रहे।
इस प्रकार, नवरात्रि के इन नौ दिनों में मां दुर्गा की आराधना के साथ कन्याओं का सत्कार करना जीवन को मंगलमय बनाने के लिए सर्वोत्तम मार्ग है। यदि इन नियमों का पालन किया जाए, तो भक्त निश्चित रूप से माता रानी की विशेष कृपा का पात्र बनता है और जीवन की समस्त बाधाएं समाप्त होती हैं।
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