राष्ट्रीय राजनीति
3 घंटे पहले
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विचारों
नक्सलवाद का नया स्वरूप और 'दिमागी नक्सली' की चुनौती
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर को छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के शिविर में सुरक्षाकर्मियों के साथ दिवाली का त्योहार मनाया। इस अवसर पर उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में एक बेहद गंभीर और महत्वपूर्ण चेतावनी दी। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भले ही जंगलों से हथियारबंद माओवादियों का खात्मा हो चुका हो, लेकिन अब देश के लोकतंत्र और संविधान के सामने 'दिमागी नक्सलियों' की एक नई और खतरनाक चुनौती खड़ी हो गई है। प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि ये वैचारिक समर्थक विभिन्न राजनीतिक दलों और तमाम अन्य संगठनों में घुसपैठ कर चुके हैं और जनता को भारत के संविधान तथा लोकतंत्र के विरुद्ध उकसाने का काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि हमें ऐसे तत्वों की पहचान करके उन्हें परास्त करना होगा ताकि देश सुरक्षित रह सके।
दंतेवाड़ा का दर्द और पिछली सरकारों की चुप्पी
बस्तर की धरती पर पिछली सरकारों की नीतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने पुरानी घटनाओं की याद दिलाई। उन्होंने 2010 में दंतेवाड़ा में हुई उस भीषण मुठभेड़ का जिक्र किया, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जांबाज सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए थे। इसी तरह उन्होंने 44 निर्दोष नागरिकों की नृशंस हत्या की घटना का भी उल्लेख किया। प्रधानमंत्री ने भावुक होते हुए कहा कि उस समय जब दंतेवाड़ा की धरती हमारे वीरों के लहू से लाल हो गई थी, तब दिल्ली के महलों में रहने वाले किसी भी नामदार की आंख से एक आंसू नहीं निकला और न ही उनकी कोई सिसकी सुनाई दी। उन्होंने कहा कि उस दौर में नक्सली हमले मानो एक सामान्य घटना बन गए थे, लेकिन सत्ता में बैठे लोगों के कान पर जूं तक नहीं रेंगती थी।
2004 से 2013 का काला अध्याय
प्रधानमंत्री ने 2004 से 2013 के आंकड़ों का हवाला देते हुए पिछली सरकारों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने बताया कि उस दौर में हर साल जितने नक्सली मारे जाते थे, उससे कहीं ज्यादा संख्या में हमारे वीर जवान शहीद हो रहे थे। नक्सलवादी संगठनों के मुखिया इन घटनाओं को अपनी जीत मानते थे और जश्न मनाते थे। उस समय सरकारों ने नक्सलवाद को एक लाइलाज बीमारी मान लिया था और इसे अपनी नियति समझकर छोड़ दिया था। आदिवासी परिवारों को उनके हाल पर जीने के लिए छोड़ दिया गया था, जबकि गोलियां चलती थीं, जवान शहीद होते थे और आम नागरिक प्रताड़ित होते थे।
राजनीतिक इच्छाशक्ति से आया बदलाव
प्रधानमंत्री ने कहा कि 2014 के बाद स्थितियां पूरी तरह से बदल गई हैं। उन्होंने कहा कि देश को आगे बढ़ाने के लिए दुश्मनों को कुचलने के वास्ते बुलंद हौसलों और मजबूत राजनीतिक रणनीति की आवश्यकता होती है। जब देश की जनता ने उन्हें सेवा का अवसर दिया, तो उसके बाद आंकड़े और हालात दोनों में बदलाव नजर आने लगे। उन्होंने गर्व के साथ साझा किया कि 47 साल बाद यह पहली बार हुआ है जब बीते एक वर्ष के दौरान सीआरपीएफ का एक भी जवान ड्यूटी के दौरान शहीद नहीं हुआ। इसे उन्होंने देश की सही नीतियों और सुरक्षाबलों के साहस की जीत करार दिया।
फंडिंग नेटवर्क पर प्रहार और आर्थिक नाकेबंदी
नक्सलियों की कमर तोड़ने के पीछे की रणनीति का खुलासा करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कई कड़े और गोपनीय कदम उठाए हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह सरकार ने नक्सलियों और अलगाववादियों के फंडिंग नेटवर्क को ध्वस्त कर दिया है। जाली मुद्रा (नकली नोटों) के नेटवर्क को नष्ट करने से न केवल उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर हुई, बल्कि उनकी पूरी आपूर्ति श्रृंखला भी ठप हो गई। हथियारों की कमी और रसद न मिलने के कारण नक्सलियों की नई भर्ती में भारी गिरावट आई है। साथ ही, सुरक्षाबलों को जमीनी अभियानों के लिए पूरी आजादी दी गई, जिससे वे हमलों का प्रभावी जवाब दे सके।
गरीबी के खिलाफ जीत और विश्व बैंक की रिपोर्ट
प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद विरोधी अभियान को विकास के साथ जोड़ते हुए कहा कि हमने पिछले 12 वर्षों में न केवल आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जीती है, बल्कि गरीबी के खिलाफ जंग में भी एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि पिछले 12 वर्षों में 50 करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी से बाहर आए हैं। 'गरीबी हटाओ' के खोखले नारों से जो काम दशकों में नहीं हो सका, उसे भारत ने महज 12 वर्षों में करके दिखा दिया है।
भविष्य के संकल्प और राष्ट्र का निर्माण
अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने भारत के भविष्य के प्रति अटूट विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि भारत के पास अपने संकल्पों को पूरा करने की असीम क्षमता है। चाहे अनुच्छेद 370 को हटाना हो, घर-घर शौचालय का निर्माण हो या टीकाकरण के दायरे को बढ़ाना हो, सरकार ने अपने हर वादे को पूरा किया है। उन्होंने दोहराया कि विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। उन्होंने देश के युवाओं पर भरोसा जताते हुए कहा कि वे निश्चित रूप से इन लक्ष्यों को प्राप्त करेंगे। इससे पहले, 15 अगस्त को 80वें स्वतंत्रता दिवस पर भी प्रधानमंत्री ने 'दिमागी नक्सलियों' के प्रति आगाह करते हुए उनके वैचारिक समर्थकों के मंसूबों को बेनकाब किया था।
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