यूपी चुनाव 2027 से पहले मायावती का आक्रामक रुख: ईवीएम पर सवाल और चंद्रशेखर आजाद पर निशाना राष्ट्रीय राजनीति एक घंटा पहले 3
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। उन्होंने लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ईवीएम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए और आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद को सीधे तौर पर भाजपा की 'बी-टीम' करार दिया है।

2027 के चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी की बदली रणनीति

उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों को देखते हुए राज्य की सियासत में दलित वोट बैंक को लेकर वर्चस्व की लड़ाई तेज हो गई है। लंबे समय से मीडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों से दूरी बनाकर रखने वाली बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने अचानक आक्रामक तेवर अपना लिए हैं। सोमवार को लखनऊ में आयोजित एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता में उन्होंने ईवीएम की पारदर्शिता पर सीधा प्रहार किया। इतना ही नहीं, नगीना लोकसभा सीट से सांसद चंद्रशेखर आजाद को लेकर उन्होंने अब तक का सबसे कड़ा राजनीतिक हमला बोला है। मायावती ने न केवल बैलेट पेपर से दोबारा चुनाव कराने की वकालत की, बल्कि इसके फायदे भी गिनाए। उनकी इस बढ़ी हुई सक्रियता और संगठन में किए गए हालिया बदलाव सीधे तौर पर दलितों के बीच अपनी खोई हुई पैठ को वापस पाने की छटपटाहट को दर्शाते हैं।

ईवीएम और चंद्रशेखर आजाद पर मायावती का हमला

मायावती ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सीधे आरोप लगाया कि नगीना लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी ने सुनियोजित तरीके से ईवीएम में हेरफेर की और चंद्रशेखर आजाद को जीत दिलाने का काम किया। उनका तर्क है कि यह सब बीएसपी के मूल दलित वोट बैंक को कमजोर करने के लिए किया गया। मायावती ने साफ शब्दों में कहा कि नगीना की जनता का भी ऐसा ही मानना है। उन्होंने कहा कि आजाद समाज पार्टी के सांसद का नगीना अनुसूचित जाति सुरक्षित सीट पर कोई वास्तविक जनाधार नहीं था, लेकिन उन्हें षड्यंत्र के तहत जितवाया गया। बीएसपी सुप्रीमो ने दलित युवाओं को सलाह दी कि वे केवल सोशल मीडिया पर चमकने वाले नेताओं के बहकावे में न आएं। उन्होंने चेतावनी दी कि धरने और प्रदर्शनों में शामिल होकर मुकदमे झेलने वाले युवाओं का भविष्य बर्बाद हो रहा है।

लोकतंत्र और मतपत्र की वकालत

मायावती का मानना है कि लोकतंत्र की असली ताकत मतदाता का विश्वास है, जो ईवीएम के कारण डगमगा गया है। उन्होंने दोहराया कि जब मतदाता को यह महसूस होने लगे कि उसका वोट किसी और के खाते में जा रहा है, तो यह लोकतंत्र की हत्या के समान है। विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के चुनाव से पहले मायावती की यह रणनीति उन्हें बचाव की मुद्रा से निकालकर हमले की मुद्रा में लाती है। ऐसा लगता है कि वे आने वाले समय में संभावित हार का ठीकरा प्रशासनिक व्यवस्था पर फोड़ने के लिए अभी से आधार तैयार कर रही हैं ताकि अपने कैडर और समर्थकों को एकजुट रखा जा सके।

पिछले 30 दिनों में मायावती की बढ़ती सक्रियता

बीते एक महीने के भीतर मायावती की कार्यशैली में आया बदलाव बीएसपी के इतिहास में काफी दुर्लभ है। पिछले 30 दिनों में उन्होंने 3 से अधिक बार प्रेस कॉन्फ्रेंस की है और कई आपात बैठकें बुलाई हैं। इसके अलावा, वह सोशल मीडिया के जरिए भी लगातार अपने संदेश साझा कर रही हैं। सितंबर महीने में उन्होंने अपने भतीजे आकाश आनंद को लेकर बड़ा निर्णय लिया और उन्हें जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। उनकी जगह ईशान आनंद को बीएसपी का नया नेशनल कोऑर्डिनेटर नियुक्त किया गया है। मात्र 20 दिनों के भीतर लखनऊ में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में बीएसपी किसी भी दल के साथ गठबंधन नहीं करेगी और अकेले ही चुनाव लड़ेगी। डॉक्टरों की सुरक्षा, आरक्षण के मुद्दे और यूपीएससी जैसे विषयों पर मायावती लगातार अपनी बात मजबूती से रख रही हैं ताकि वे खुद को फिर से मुख्यधारा की चर्चाओं में ला सकें।

दलित वोट बैंक और अस्तित्व की लड़ाई

बहुजन समाज पार्टी के लिए 2027 का चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी महज 1 सीट जीत सकी थी और उसका वोट शेयर घटकर 12.8 प्रतिशत रह गया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन और भी खराब रहा, जिसमें उसका खाता भी नहीं खुला और वोट शेयर गिरकर 9.3 प्रतिशत के करीब आ गया। मायावती की मौजूदा आक्रामकता के पीछे का बड़ा कारण समाजवादी पार्टी का 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूला है। इसके साथ ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर आजाद का बढ़ता हुआ प्रभाव बीएसपी के वजूद के लिए सीधी चुनौती पेश कर रहा है। मायावती को यह आभास हो गया है कि यदि 2027 में भी दलित वोट बैंक खिसक गया, तो बीएसपी की राज्य की राजनीति में वापसी नामुमकिन होगी। यही वजह है कि उन्होंने गांव-गांव जाकर कैडर को मजबूत करने का निर्देश दिया है और मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास कर रही हैं कि बीएसपी ही बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर और कांशीराम की विचारधारा की एकमात्र सच्ची उत्तराधिकारी है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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