उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
कांशीराम की सियासी विरासत की जंग
बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि 9 अक्टूबर को है। उत्तर प्रदेश में आगामी 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर उनकी राजनीतिक प्रासंगिकता और अधिक बढ़ गई है। आज 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर यह चर्चा भी तेज हो गई है कि कैसे कांशीराम ने महात्मा गांधी के सामाजिक सुधार के प्रयासों को एक नया आयाम दिया। हालांकि यह जगजाहिर है कि कांशीराम महात्मा गांधी द्वारा दलितों को दिए गए हरिजन नाम के सख्त खिलाफ थे।
कांशीराम की विचारधारा और मौजूदा राजनीति
जानकारों का मानना है कि महात्मा गांधी जहां छुआछूत और सामाजिक भेदभाव को मिटाने के लिए काम करते रहे, वहीं कांशीराम ने उत्तर भारत में दलित उत्थान के लिए एक सशक्त और व्यापक आंदोलन खड़ा किया। वर्तमान समय में राहुल गांधी, अखिलेश यादव, चंद्रशेखर आजाद और मायावती जैसे नेता खुद को कांशीराम के विचारों के सबसे करीब दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। इन नेताओं के बीच इस बात की होड़ मची है कि असली उत्तराधिकारी कौन है।
राजनीतिक दलों में वर्चस्व की लड़ाई
उत्तर प्रदेश की चुनावी बिसात पर कांशीराम का नाम किसी भी पार्टी के लिए तुरुप का पत्ता साबित हो सकता है। यही कारण है कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले हर प्रमुख दल अपनी रणनीति में कांशीराम के प्रभाव को शामिल करने का प्रयास कर रहा है। इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए आने वाले दिनों में हम कांशीराम के जीवन, उनके क्रांतिकारी विचारों और आज की राजनीति में उनकी मौजूदगी पर विस्तृत जानकारी साझा करेंगे।
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