राष्ट्रीय राजनीति
2 घंटे पहले
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गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी पहचान
तेलंगाना के सूर्यापेट जिले में स्थित जानपहाड़ सैदुलु बाबा की दरगाह सदियों से आपसी भाईचारे और साझा संस्कृति का केंद्र बनी हुई है। पालाकीडू मंडल के जानपहाड़ गांव में स्थित यह पवित्र मजार हज़रत जानपहाड़ सैदुलु बाबा और हज़रत मोइनुद्दीन को समर्पित है। लगभग 400 साल पुरानी यह दरगाह इस बात का जीता-जागता सबूत है कि आस्था के सामने मजहब और जाति की दीवारें मायने नहीं रखतीं।
परंपराओं का अनोखा संगम
आमतौर पर मुस्लिम दरगाहों पर फूल और चादर चढ़ाने की रवायत होती है, लेकिन जानपहाड़ दरगाह की कार्यशैली काफी अलग है। यहां सूफी और स्थानीय दक्षिण भारतीय परंपराओं का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। श्रद्धालु यहां चादर और संदल पेश करने के साथ ही पूरी निष्ठा के साथ नारियल भी चढ़ाते हैं और फोड़ते हैं। इतना ही नहीं, मन्नत पूरी होने पर कई परिवार दरगाह परिसर में अपने बच्चों का मुंडन संस्कार भी करवाते हैं और वहीं पारंपरिक भोज का आयोजन करते हैं। यह दृश्य बताता है कि कैसे अलग-अलग विश्वासों को मानने वाले लोग एक ही स्थान पर अपनी श्रद्धा प्रकट करते हैं।
लाखों लोगों का अटूट विश्वास
दरगाह में होने वाला सालाना उर्स-ए-शरीफ आकर्षण का मुख्य केंद्र होता है। इस तीन दिवसीय आयोजन के दौरान तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और आसपास के कई राज्यों से लाखों की तादाद में जायरीन यहां पहुंचते हैं। इस दरगाह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उर्स में जुटने वाली कुल भीड़ में हिंदू श्रद्धालुओं की संख्या मुस्लिम अकीदतमंदों से भी कहीं ज्यादा होती है। संदल शरीफ के जुलूस, गुस्ल-ए-शरीफ और रातभर चलने वाली कव्वालियों के दौर में समाज के हर वर्ग के लोग कंधे से कंधा मिलाकर इबादत करते हुए नजर आते हैं।
रूहानी शांति और सुकून का ठिकाना
स्थानीय निवासी और दूर-दराज से आने वाले भक्तों का यह अटूट विश्वास है कि जो भी व्यक्ति सच्चे मन से यहां अपनी मुराद लेकर आता है, बाबा उसे खाली हाथ नहीं जाने देते। आज के दौर में जब तनाव और भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग मानसिक शांति की तलाश में भटकते हैं, तब जानपहाड़ दरगाह की दहलीज उन्हें एक विशेष रूहानी सुकून और जीने का हौसला प्रदान करती है।
एकता का संदेश
नफरत और दूरियों के इस दौर में जानपहाड़ की यह दरगाह इंसानियत और साझी आस्था का वह दीप जलाए हुए है, जो पूरे देश को प्रेम और भाईचारे का पैगाम देता है। दरगाह की यह परंपरा न केवल सूफीवाद की उदारता को दर्शाती है, बल्कि भारत की उस गंगा-जमुनी तहजीब को भी जीवंत बनाए रखती है, जो समाज को जोड़ने का काम करती है।
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