हिमाचल: घेपन झील पर GLOF का खतरा, 14 किलोमीटर की चढ़ाई कर हालात का जायजा लेने पहुंचीं डीसी किरण भड़ाना हिमाचल प्रदेश 2 घंटे पहले 7
नेपाल में ग्लेशियर फटने से हुई त्रासदी के बाद हिमाचल प्रदेश प्रशासन सतर्क हो गया है। लाहौल-स्पीति जिले में स्थित घेपन ग्लेशियल झील के बढ़ते जलस्तर को देखते हुए डीसी ने खुद दुर्गम रास्ते से वहां पहुंचकर निरीक्षण किया और आपदा प्रबंधन को लेकर अहम निर्देश दिए।

घेपन झील पर मंडराया खतरे का साया

नेपाल में ग्लेशियर फटने के बाद हुई तबाही से सबक लेते हुए हिमाचल प्रदेश का प्रशासन पूरी तरह अलर्ट पर आ गया है। लाहौल-स्पीति जिले में 4,070 मीटर की ऊंचाई पर मौजूद घेपन ग्लेशियल झील का बढ़ता हुआ जलस्तर अब जिला प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। इस झील से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF की प्रबल आशंका को देखते हुए जिला उपायुक्त किरण भड़ाना ने मोर्चा संभाल लिया है। स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए उन्होंने स्वयं 14 किलोमीटर की चुनौतीपूर्ण और कठिन पैदल चढ़ाई तय की और झील स्थल तक पहुंचकर जमीनी हकीकत को परखा।

15 सदस्यीय टीम के साथ मौके पर पहुंचे अधिकारी

उपायुक्त और जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष किरण भड़ाना की अगुवाई में कुल 10 विभागों के 15 अधिकारियों और कर्मचारियों की एक विशेष टीम ने घेपन झील का गहन निरीक्षण किया। इस दौरान टीम ने झील के बढ़ते जलस्तर, आसपास के भू-भाग की बनावट और पानी के बहाव के संभावित रास्तों का बारीकी से अवलोकन किया। टीम ने इस बात पर विस्तृत मंथन किया कि किस प्रकार जलस्तर को नियंत्रित किया जा सकता है और यदि कोई आपदा की स्थिति बनती है तो उससे निपटने की कार्ययोजना क्या होनी चाहिए। चूंकि यह क्षेत्र बेहद दुर्गम है, इसलिए तकनीकी टीम ने बेस कैंप में रात बिताई, जबकि उपायुक्त स्वयं निरीक्षण के बाद वापस लौट आईं। पूरी टीम बुधवार दोपहर तक केलांग वापस पहुंच गई।

5 मिनट में हो सकती है भारी तबाही

उपायुक्त किरण भड़ाना ने चेतावनी देते हुए कहा कि घेपन झील के चारों ओर कई ग्लेशियर और ऊंचे पर्वत स्थित हैं, जिनकी स्थिरता पर लगातार निगरानी रखना अत्यंत आवश्यक है। नेपाल की त्रासदी ने यह साबित कर दिया है कि ग्लेशियर की अस्थिरता कितनी घातक हो सकती है। प्रशासन इस मामले को लेकर राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ मिलकर काम करेगा। शुरुआती आकलन में यह बात सामने आई है कि यदि झील से पानी का बहाव शुरू होता है, तो आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचने में महज 22 मिनट का समय लग सकता है। हालांकि, जमीनी और व्यावहारिक परिस्थितियों को देखें तो पानी की भयावह गति इतनी तेज हो सकती है कि यह मात्र 5 मिनट के भीतर आबादी वाले इलाकों में तबाही मचा सकता है। इसे देखते हुए प्रभावित क्षेत्रों में मॉक ड्रिल और जागरूकता अभियानों को प्राथमिकता दी जा रही है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम तेज

जिला प्रशासन अब घेपन झील में अत्याधुनिक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की दिशा में तेजी से कदम उठा रहा है। इस संबंध में सी-डैक तिरुवनंतपुरम द्वारा तैयार की गई प्रणाली का पूर्व में सिस्सु झील में सफल परीक्षण किया जा चुका है। इसके अलावा भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की टीम भी इस झील का वैज्ञानिक अध्ययन पूरा कर चुकी है। उपायुक्त ने जोर देकर कहा कि ऊंचाई वाले दुर्गम इलाकों में बदलती प्राकृतिक परिस्थितियों के बीच बेहतर समन्वय, निरंतर निगरानी और पूर्व तैयारी ही आपदा के जोखिम को कम करने का एकमात्र सुरक्षा कवच है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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