कश्मीर में 1990 के पहले जैसा माहौल, दुर्गा मंदिर में हवन और कंजक पूजन से लौटी रौनक जम्मू-कश्मीर 7 घंटे पहले 2
श्रीनगर के ऐतिहासिक दुर्गा मंदिरों में नवरात्रि की धूम ने तीन दशक पुराने माहौल की यादें ताजा कर दी हैं। देश भर से पहुंचे कश्मीरी पंडितों ने विशेष पूजा-अर्चना के साथ घाटी में शांति और अपनी घर वापसी की कामना की है।

कश्मीर में नवरात्रि की भव्य रौनक

देश भर में नवरात्रि का पर्व धूमधाम से मनाया जा रहा है, लेकिन कश्मीर घाटी का नजारा इन दिनों कुछ अलग ही कहानी बयां कर रहा है। श्रीनगर के विभिन्न मंदिरों में नवरात्रि के नौवें दिन नवमी के अनुष्ठान संपन्न हुए। यह दृश्य देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो 1990 के दशक से पहले का खुशहाल कश्मीर फिर से लौट आया हो। कश्मीरी पंडितों के चेहरों पर इस दौरान खुशी और आस्था की झलक साफ देखी जा सकती थी।

दुर्गा नाथ मंदिर में गूंजे भजन

श्रीनगर का ऐतिहासिक दुर्गा नाथ मंदिर इस वर्ष नवरात्रि के दौरान आस्था का प्रमुख केंद्र बना रहा। यहां कई वर्षों के अंतराल के बाद भक्ति और विश्वास का ऐसा सुंदर संगम देखने को मिला, जो पुराने समय की यादें ताजा कर देता है। भारत के अलग-अलग राज्यों से बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित इस विशेष आयोजन में शामिल होने के लिए श्रीनगर पहुंचे। इन श्रद्धालुओं ने पूरी रात चलने वाली विशेष प्रार्थनाओं और भजन-कीर्तन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इस दौरान मंदिर परिसर में हवन का आयोजन किया गया और चारों ओर जय माता दी के जयकारे गूंज उठे।

शांति और घर वापसी की विशेष प्रार्थना

महानवमी के इस पावन मौके पर भक्तों ने विशेष तौर पर कश्मीर में स्थाई शांति और सद्भाव की स्थापना के लिए प्रार्थना की। कश्मीरी पंडितों की सबसे बड़ी इच्छा अब अपनी जड़ों की ओर लौटने की है। इस धार्मिक अनुष्ठान के जरिए उन्होंने अपनी मातृभूमि में फिर से बसने की कामना की। उल्लेखनीय है कि श्रीनगर के शीतल नाथ मंदिर में भी इस बार एक सुखद परिवर्तन देखा गया है। लगभग 36 साल से वीरान पड़े इस ऐतिहासिक मंदिर में फिर से घंटियों की आवाज सुनाई दी, जो एक बड़े बदलाव का संकेत है।

महाअष्टमी और महानवमी का एक साथ संयोग

इस बार चंद्र कैलेंडर की विशेष स्थिति के कारण महाअष्टमी और महानवमी एक ही दिन मनाई गई। इस अवसर पर मंदिर प्रांगण में कंजक पूजन का भव्य आयोजन किया गया। स्थानीय लोगों द्वारा छोटी कन्याओं को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया और मंदिर में बैठाया गया। भक्तों और पुजारियों ने पूरी श्रद्धा के साथ इन कन्याओं के पैर धोए और उन्हें पारंपरिक भोग, जिसमें हलवा, पूरी और चने शामिल थे, परोसा। महा नवमी और अष्टमी की पूजा के साथ कंजक पूजन में उमड़ी भीड़ को देखकर वहां मौजूद हर व्यक्ति भावुक हो गया। इस भीड़ को देखकर ऐसा लगा जैसे कश्मीर में फिर से जन्नत लौट आई हो और मां दुर्गा की कृपा बरस रही हो।

बदलते हालात और नई उम्मीदें

इस उत्सव में शामिल होने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से आए कश्मीरी पंडितों ने अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने बताया कि 1990 के दशक में जो लोग अपनी जन्मभूमि छोड़कर जाने को मजबूर हुए थे, वे अब वापस लौटने के लिए उत्सुक हैं। क्षेत्र के हालात में आए सुधार ने उनके विश्वास को और मजबूत किया है। आतंकवाद के दौर में जो मंदिर वर्षों तक वीरान और खामोश रहे थे, वे पिछले कुछ वर्षों से एक बार फिर पूजा और अर्चना के केंद्र बन गए हैं। कश्मीरी पंडितों का कहना है कि उन्होंने विशेष प्रार्थना की है कि यह शांति और सुकून का माहौल बना रहे, ताकि सभी विस्थापित लोग अपने घरों को वापस लौट सकें।

इतिहास के पन्नों से वर्तमान तक का सफर

1990 के दशक से पहले कश्मीर में दिवाली, नवरात्रि और अन्य त्योहारों का उल्लास देखते ही बनता था। उस समय मंदिरों के बाहर बड़े-बड़े मेले लगा करते थे और पूरा वातावरण भक्तिमय रहता था। हालांकि, बाद के वर्षों में आतंकवाद के दंश ने मंदिरों की घंटियों को खामोश कर दिया और कश्मीरी पंडितों को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ा। मगर हालिया वर्षों में घाटी की फिजा बदल रही है। इस बदलाव के कारण न केवल कश्मीरी पंडित इन त्योहारों में शिरकत करने के लिए बड़ी संख्या में वापस आ रहे हैं, बल्कि उनके मन में यह विश्वास भी जागृत हुआ है कि वे जल्द ही अपनी जड़ों और अपनी मातृभूमि पर स्थाई रूप से लौट पाएंगे।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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