IIT कानपुर के पढ़े-लिखे गौतम की कहानी: अमेरिका में 2 साल से बेरोजगारी और संघर्ष की दास्तान करियर एक घंटा पहले 7
आईआईटी कानपुर और स्टोनी ब्रुक से पढ़ाई करने वाले 61 वर्षीय गौतम देव आज अमेरिका में आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। दो साल पहले लिए गए एक गलत फैसले ने उनका करियर और जीवन पूरी तरह बदल दिया है।

अमेरिका में मेधावी इंजीनियर का संघर्ष

अक्सर यह माना जाता है कि अगर किसी के पास IIT कानपुर की डिग्री है, अमेरिका की प्रतिष्ठित स्टोनी ब्रुक यूनिवर्सिटी से PhD की उपाधि है और टेक इंडस्ट्री का 20 साल से अधिक का लंबा अनुभव है, तो उसे जीवन में कभी भी बेरोजगारी का सामना नहीं करना पड़ेगा। अमेरिका के कॉरपोरेट जगत में ऐसे अनुभवी प्रोफेशनल्स की भारी मांग मानी जाती है। हालांकि, 61 वर्षीय गौतम देव की कहानी इस धारणा को पूरी तरह गलत साबित कर रही है। अमेरिका में रहने वाले गौतम की वर्तमान स्थिति ने टेक इंडस्ट्री की उस कड़वी सच्चाई को सामने ला दिया है, जिस पर लोग खुलकर बात करने से कतराते हैं। कभी डलास में एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर शानदार जीवन व्यतीत करने वाले गौतम पिछले 2 साल से एक स्थायी नौकरी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। आज स्थिति यह है कि उन्हें अपना घर चलाने और किराया चुकाने के लिए क्राउडफंडिंग का सहारा लेना पड़ रहा है।

गौतम देव की शैक्षणिक और पेशेवर योग्यता

गौतम देव के लिंक्डइन प्रोफाइल और उनके करियर पर नजर डालें तो पता चलता है कि वह केवल एक साधारण कोडर नहीं हैं, बल्कि विज्ञान और तकनीक की गहरी समझ रखने वाले एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति हैं। उन्होंने SUNY, Stony Brook यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में PhD की है। उनकी तकनीकी दक्षता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें J2EE, XML, JSP, EJB, Struts, Oracle और Hibernate जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों पर महारत हासिल है। अपनी नियमित नौकरी के अलावा भी वह कई रचनात्मक और ओपन-सोर्स परियोजनाओं के साथ जुड़े रहे हैं।

तकनीकी और सामाजिक कार्यों में योगदान

गौतम देव ने Fast Code नाम से एक ओपन-सोर्स एलिप्स प्लगइन प्रोजेक्ट विकसित किया था। इसके साथ ही, उनकी शेयर बाजार में भी काफी गहरी रुचि रही है, जिसे लेकर वह stock-article.com वेबसाइट भी चलाते थे। समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए उन्होंने whocaresforyou.com के माध्यम से जरूरतमंद संस्थाओं की मदद करने का बीड़ा भी उठाया था। इतने शानदार और प्रभावशाली रिज्यूमे के बावजूद आज उनका बेरोजगार होना किसी के लिए भी हैरानी का विषय हो सकता है, लेकिन यह अमेरिका के वर्तमान जॉब मार्केट की सच्चाई है।

वह एक फैसला जो बन गया मुसीबत

गौतम देव के जीवन में उथल-पुथल की शुरुआत सितंबर 2024 में हुई। उस समय वह डलास में एक आईटी कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। कंपनी ने उनके सामने एक शर्त रखी कि अपनी नौकरी सुरक्षित रखने के लिए उन्हें दूसरे राज्य में स्थानांतरित होना होगा। व्यक्तिगत कारणों से उन्होंने उस राज्य में जाने से मना कर दिया और अपनी नौकरी छोड़ दी। उन्हें पूरा विश्वास था कि उनके पास 20 साल का अनुभव है, इसलिए दूसरी नौकरी ढूंढना उनके लिए बेहद आसान होगा। लेकिन अमेरिकी टेक मार्केट में छाई मंदी, लगातार हो रही छंटनी और उनकी उम्र ने उनके सभी सपनों पर पानी फेर दिया।

क्राउडफंडिंग और भविष्य की चिंता

पिछले 2 साल तक लगातार असफलता मिलने के कारण उनकी सारी जमा-पूंजी खत्म हो गई। देखते ही देखते स्थिति ऐसी बन गई कि घर का किराया देना और क्रेडिट कार्ड का कर्ज चुकाना नामुमकिन हो गया। जब कॉर्पोरेट जगत के तमाम दरवाजे उनके लिए बंद हो गए, तो पेट पालने के लिए उन्हें Uber, DoorDash और Walmart Spark जैसे प्लेटफॉर्म्स पर एक गिग वर्कर के रूप में काम करने के लिए मजबूर होना पड़ा। आखिरकार जनवरी के महीने में उन्होंने GoFundMe के जरिए क्राउडफंडिंग शुरू की, जिससे उन्हें 9,000 डॉलर की मदद मिली और उन्होंने अपने बिलों का भुगतान किया। अब गौतम देव जनवरी में 62 वर्ष के होने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि उन्हें सोशल सिक्योरिटी का लाभ मिल सके। फिलहाल वह वापस भारत लौटने की संभावनाओं पर भी गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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