झारखंड: इस प्राचीन मंदिर में दर्शन से मिटता है मांगलिक दोष, नवरात्रि में होती है अनोखी बलि धर्म 3 घंटे पहले 3
झारखंड के पलामू स्थित मंगला गौरी मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध है, जहां नवरात्रि के दौरान बिना किसी जीव की बलि दिए सात्विक तरीके से पूजन की परंपरा निभाई जाती है।

पलामू का ऐतिहासिक मंगला गौरी मंदिर

झारखंड का पलामू जिला अपनी सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां के जिला मुख्यालय मेदिनीनगर में छह मुहान चौक के समीप स्थित मंगला गौरी मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का एक प्रमुख केंद्र है। नवरात्रि के पावन पर्व के दौरान इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। यह मंदिर न केवल अपनी प्राचीनता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी अनूठी धार्मिक परंपराओं के कारण भी भक्तों के बीच गहरी आस्था का विषय बना हुआ है। नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की आराधना की जाती है और लोग अपने परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि के लिए माता के दर पर मत्था टेकते हैं।

मांगलिक दोष से मुक्ति की मान्यता

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां मां के दर्शन मात्र से भक्तों के जीवन के संकट दूर हो जाते हैं। मंदिर के प्रधान पुजारी सुरेश चंद्र पांडेय के अनुसार, यहां विराजमान मां मंगला काली की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि जिन युवक-युवतियों की कुंडली में मांगलिक दोष या अष्टमेश मंगला का प्रभाव होता है, वे यदि श्रद्धापूर्वक यहां आकर दर्शन और पूजन करें, तो उनकी बाधाएं दूर हो जाती हैं। यही कारण है कि विवाह संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोग और उनके परिजन बड़ी संख्या में यहां आकर मां से मन्नत मांगते हैं। भक्त अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए माता को जोड़ा नारियल, चुनरी और आभूषण अर्पित करते हैं।

बलि की अनोखी और सात्विक परंपरा

नवरात्रि के दौरान इस मंदिर में बलि देने की एक ऐसी अनूठी परंपरा है, जो अहिंसा का संदेश देती है। आम तौर पर मंदिरों में बलि के नाम पर पशुओं की बलि की चर्चा होती है, लेकिन मंगला गौरी मंदिर में परंपरा पूरी तरह से अलग है। यहां किसी भी पशु की बलि नहीं दी जाती, जिससे खून की एक बूंद भी नहीं बहती। इसके बजाय भक्त नारियल और भतुआ (कुम्हड़ा) की बलि अर्पित करते हैं। यह तरीका सात्विक है और भक्तों की आस्था को भी पुष्ट करता है। इस परंपरा के कारण ही यह मंदिर दूर-दूर तक चर्चा में रहता है और लोग इसे शांति और भक्ति का प्रतीक मानते हैं।

मंदिर का ऐतिहासिक विकास

इस पवित्र धार्मिक स्थल का विकास वर्ष 1953 से 1980 के बीच हुआ। धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार, पुरी के शंकराचार्य के मार्गदर्शन में यहां विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और स्वरूप स्थापित किए गए थे। मंदिर के गर्भगृह में मां भगवती स्वयं प्राकृतिक पिंड के रूप में विराजमान हैं, जो भक्तों की श्रद्धा का मुख्य केंद्र है। इस मंदिर की भव्यता और यहां की सकारात्मक ऊर्जा भक्तों को बरबस ही अपनी ओर आकर्षित करती है।

एक ही परिसर में अनेक देवी-देवताओं का वास

मंगला गौरी मंदिर परिसर का विस्तार काफी बड़ा है। यहां केवल मां मंगला काली ही नहीं, बल्कि कई अन्य देवी-देवताओं का भी दरबार सजा हुआ है। परिसर में प्रवेश करते ही भक्तों को मां दक्षिणेश्वर काली, मां भगवती, जगतदात्रिका और सप्तमात्रिका के दर्शन होते हैं। इसके साथ ही भगवान शिव का दरबार, राम-सीता मंदिर, माता शीतला का स्थान और पंचमुखी हनुमान जी की भव्य प्रतिमा भी स्थापित है। यहां रामकृष्ण परमहंस और माता सारदा देवी की प्रतिमाएं भी हैं, जो इस पूरे परिसर को एक दिव्य वातावरण प्रदान करती हैं। नवरात्रि के दिनों में यहां विशेष पूजा, आरती और अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता है, जिसके लिए मंदिर प्रबंधन द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम और सुविधाओं की विशेष व्यवस्था की जाती है ताकि दूर-दराज से आने वाले भक्तों को कोई परेशानी न हो।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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