राष्ट्रीय राजनीति
13 घंटे पहले
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विचारों
ब्रिक्स की अध्यक्षता और बदलता वैश्विक परिदृश्य
वर्तमान समय में भारत ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता कर रहा है और यह जिम्मेदारी ऐसे समय में आई है जब अमेरिका के साथ भारत के जियोस्ट्रेटेजिक संबंधों में गहरा अनिश्चितता का दौर चल रहा है। यह स्थिति भारत के लिए कूटनीतिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि ब्रिक्स का मंच भारत को रूस और चीन जैसे देशों के साथ मिलकर काम करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। हालांकि, अमेरिका भी भारत का एक प्रमुख आर्थिक और रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। भारत इस समय एक कठिन विरोधाभास के बीच खड़ा है। उसे अमेरिका की आवश्यकता तो है, लेकिन वह अपनी पूरी निर्भरता केवल उसी पर रखने का जोखिम नहीं उठा सकता है। अमेरिका के साथ रिश्तों में लगातार बढ़ रहे तनाव ने भारत को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी कूटनीतिक रणनीति में बदलाव करे। भारत अब विरोधी महाशक्तियों के बीच एक संतुलित तालमेल बिठाकर अपनी रणनीतिक पैंतरेबाजी को मजबूती दे रहा है। यह ग्लोबल पॉलिटिक्स में एक बड़ा कदम है और ब्रिक्स के माध्यम से भारत खुद को ग्लोबल साउथ की बुलंद आवाज के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
भारत और अमेरिका के रिश्तों में आया तनाव
भारत और अमेरिका के कूटनीतिक संबंध लंबे समय तक काफी स्थिर रहे हैं, लेकिन मौजूदा हालात में दूरियां सिर्फ राजनीतिक नहीं रह गई हैं। ट्रेड और टैरिफ से जुड़े विवाद अब रिश्तों में कड़वाहट पैदा कर रहे हैं। इसके अलावा, रूसी तेल के आयात और भारतीय डायस्पोरा जैसे मुद्दों पर दोनों देशों के नजरिए अलग-अलग हैं। दोनों के बीच इस दूरी का सबसे बड़ा कारण उम्मीदों का अंतर है। अमेरिका चाहता है कि भारत चीन के खिलाफ उसके टकराव में एक ढाल बनकर खड़ा रहे, जबकि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत पर ऐसा कोई भी समझौता करने को तैयार नहीं है। दोनों देशों के वर्तमान संबंधों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे वे किसी टॉक्सिक रिलेशनशिप में फंस गए हों, जहां साथ रहना मजबूरी है लेकिन तालमेल का अभाव है।
ट्रंप 2.0 प्रशासन से भारत के सामने चुनौतियां
ट्रंप प्रशासन 2.0 के तहत भारत की रणनीतिक निर्भरता एक बड़ी अनिश्चितता में बदल गई है। ट्रंप के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच व्यक्तिगत समीकरण काफी बेहतर थे। दोनों नेताओं ने कई मंचों को साझा किया था और चीन तथा डिफेंस सहयोग जैसे मुद्दों पर एक ठोस सहमति बनी थी। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में माहौल पूरी तरह से अप्रत्याशित हो गया है। ट्रेड और टैरिफ के प्रति ट्रंप का सख्त रवैया भारत के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गया है। भारत के लिए समस्या केवल नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि अमेरिकी इरादों को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता है। जब कोई महत्वपूर्ण साझेदार अत्यधिक स्वार्थी होने लगता है, तो दूसरे देश के पास अपने बाहरी विकल्पों को तलाशने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। भारत अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
क्या चीन या रूस अमेरिका की जगह ले सकते हैं?
भारत इस बात से पूरी तरह अवगत है कि आर्थिक और तकनीक के क्षेत्र में कोई भी देश अमेरिका की जगह नहीं ले सकता है। अमेरिका भारत के लिए दुनिया का सबसे बड़ा कंज्यूमर मार्केट है। जुलाई 2026 तक भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार बढ़कर लगभग 150 बिलियन डॉलर के स्तर पर पहुंच चुका है, जिसमें भारत के पक्ष में 32 बिलियन डॉलर का भारी ट्रेड सरप्लस है। अमेरिका भारतीय वस्तुओं और सेवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है। अगर ट्रंप प्रशासन इस व्यापार घाटे को कम करने के लिए कोई कड़ा कदम उठाता है, तो भारतीय निर्यात क्षेत्र पर इसका गंभीर असर पड़ सकता है। इसी संभावित झटके से बचने के लिए भारत ने खुद को तैयार करना शुरू कर दिया है। तकनीक और उन्नत हथियारों के मामले में भी अमेरिका की विश्वसनीयता रूस से अधिक है। यूक्रेन युद्ध के कारण रूस का हथियार स्टॉक खत्म हो चुका है और वह अब बीजिंग पर अधिक निर्भर हो गया है। मॉस्को अपने हितों के लिए चीन से रिश्तों को खराब नहीं करना चाहता, जिससे भारत के लिए मुश्किलें बढ़ी हैं।
इंडो-पैसिफिक रीजन में भारत की नई रणनीति
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी भारत की भूमिका और रणनीति का महत्व काफी बढ़ गया है। अमेरिका इस क्षेत्र में भारत को एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है, लेकिन ट्रंप प्रशासन 2.0 ने क्वाड जैसे मंचों में बहुत कम रुचि दिखाई है। अमेरिका द्वारा इंडो-पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर पुनः पैसिफिक कमांड करना यह संकेत देता है कि अमेरिका हिंद महासागर से धीरे-धीरे पीछे हट रहा है। इससे चीन के लिए अपना प्रभाव बढ़ाने का रास्ता साफ हो सकता है। अमेरिकी प्रतिबद्धता में आती यह कमी भारत के लिए चिंता का विषय है। यही कारण है कि भारत ने अब मॉरीशस, इंडोनेशिया, सिंगापुर और न्यूजीलैंड जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ बनाने पर जोर देना शुरू कर दिया है।
डिप्लोमैटिक हेजिंग स्ट्रेटजी और भारत का भविष्य
भारत अब 'डिप्लोमैटिक हेजिंग स्ट्रेटजी' अपना रहा है। इस रणनीति का सार यह है कि कोई भी देश किसी एक सहयोगी को चुनने के बजाय संतुलन बनाए रखता है। भारत किसी एक महाशक्ति का कठोर पक्ष लेने के बजाय प्रतिस्पर्धी देशों के साथ संबंध बनाए रखने की नीति पर काम कर रहा है। ट्रंप प्रशासन को यह समझना होगा कि भारतीय विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों से प्रेरित होती है। यदि ट्रंप घरेलू राजनीति के लिए भारत पर दबाव बनाना जारी रखते हैं, तो आने वाले समय में दोनों देशों के रिश्तों में गिरावट आना निश्चित है।
ब्रिक्स प्रेसीडेंसी का महत्व
भारत कूटनीतिक मोर्चे पर एक बहुत बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है। भारत जल्द ही रूसी राष्ट्रपति पुतिन और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी करने की योजना बना रहा है। इसका उद्देश्य अपने व्यापार को वैश्विक स्तर पर डायवर्सिफाई करना है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और विदेश मंत्री एस जयशंकर का चीन और रूस का हालिया दौरा इसी रणनीति का हिस्सा है। अगस्त 2026 में भोपाल के कुशाभाऊ ठाकरे इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आयोजित ब्रिक्स कल्चरल समिट ने भारत की कूटनीतिक छवि को वैश्विक पटल पर मजबूती दी है। भारत अब केवल एक दर्शक नहीं, बल्कि दुनिया के बड़े फैसलों का सक्रिय भागीदार बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यह हेजिंग स्ट्रेटजी भारत को भविष्य में एक नई ग्लोबल पावर के रूप में स्थापित करने में सहायक साबित होगी।
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