सूरजकुंड दिवाली मेले में छाईं गुजरात की हथकरघा साड़ियां, जानिए किस साड़ी को बनने में लगते हैं 6 महीने हरियाणा एक घंटा पहले 5
फरीदाबाद के सूरजकुंड दिवाली मेले में गुजरात से आईं हथकरघा साड़ियां लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं, जहां हाथों से तैयार टसर और कांथा सिल्क की साड़ियों पर विशेष छूट दी जा रही है।

त्योहारी सीजन में अगर आप दिवाली के लिए पारंपरिक और किफायती पहनावे की तलाश कर रहे हैं, तो हरियाणा के फरीदाबाद में चल रहा सूरजकुंड दिवाली मेला आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प साबित हो सकता है। इस मेले में देश के अलग-अलग हिस्सों से आए कारीगर अपने हस्तशिल्प का प्रदर्शन कर रहे हैं। इस बार मेले के मुख्य आकर्षणों में गुजरात से आई पूजा की विशेष हथकरघा साड़ियां शामिल हैं, जिन्हें देखने और खरीदने के लिए लोगों की भारी भीड़ जुट रही है।

एमबीए की पढ़ाई के बाद चुना पारंपारिक बुनाई का रास्ता

इन साड़ियों की प्रदर्शनी लगाने वाली पूजा की जीवन यात्रा काफी दिलचस्प है। उन्होंने MBA की उच्च शिक्षा हासिल की है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट जगत में जाने के बजाय देश की पारंपरिक बुनाई कला को बढ़ावा देने का फैसला किया।

  • पूजा पिछले 17 साल से साड़ियों के इस पारंपरिक कारोबार से जुड़ी हुई हैं।
  • इस व्यवसाय को संभालने में उनके पति भी उनका पूरा साथ देते हैं।
  • इन साड़ियों का निर्माण गुजरात स्थित उनके गांव के स्थानीय बुनकर करते हैं।
  • इस पहल के जरिए गांव के अनेक लोगों को रोजगार का एक स्थाई साधन मिल रहा है।

मशीन नहीं, पूरी तरह से हाथों की जादूगरी से तैयार होती हैं साड़ियां

पूजा के स्टॉल पर उपलब्ध साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें तैयार करने में किसी भी प्रकार की मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यहां रखी हर एक साड़ी शत-प्रतिशत हाथों की बुनाई और बारीकी से किए गए काम का नमूना है।

मेले में बिक्री के लिए लाई गई साड़ियों की प्रमुख श्रेणियों में कांथा सिल्क, टसर सिल्क, पटोला और कांथा क्रेप साड़ियां शामिल हैं। हाथ से बुने जाने के कारण इनका फैब्रिक पूरी तरह से प्योर होता है और इनकी टिकाऊपन भी सामान्य साड़ियों से कहीं अधिक होती है।

एक साड़ी को बनाने में लगते हैं 3 से 6 महीने का समय

हथकरघा कला में लगने वाले समय और मेहनत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक सिंगल साड़ी को तैयार करने में कई महीनों की कड़ी मेहनत लगती है:

  • कांथा क्रेप साड़ी: यह प्योर क्रेप कपड़े पर बनाई जाती है। इस पर हाथ से की जाने वाली बेहद बारीक कढ़ाई और बुनाई के कारण इसे पूरी तरह तैयार करने में लगभग 6 महीने का समय लग जाता है। इसकी कीमत 4500 रुपये रखी गई है।
  • टसर सिल्क साड़ी: टसर सिल्क के कपड़े पर भी कारीगर हाथों से बहुत ही सूक्ष्म काम करते हैं। एक टसर सिल्क साड़ी को तैयार होने में करीब 3 महीने का वक्त लगता है।
  • पटोला साड़ी: इनकी बुनाई भी पूरी तरह पारंपरिक तरीके से हाथों द्वारा ही की जाती है।

किफायती दाम और मेले में 15 प्रतिशत तक की विशेष छूट

सूरजकुंड मेले में आने वाले ग्राहकों के लिए पूजा ने विशेष डिस्काउंट की व्यवस्था भी की है। मेले में मिलने वाली साड़ियों की कीमतें और डिस्काउंट ऑफर इस प्रकार हैं:

बाजार की तुलना में मेले में सबसे ज्यादा मांग टसर सिल्क की साड़ियों की देखी जा रही है। टसर सिल्क साड़ियों की शुरुआती कीमत 2500 रुपये है। मेले में खरीदारी करने आने वाले ग्राहकों को 10 से 15 प्रतिशत तक की छूट प्रदान की जा रही है। ग्राहक अपनी पसंद और साड़ियों की रेंज के आधार पर इस छूट का लाभ उठा सकते हैं। इस डिस्काउंट के बाद टसर सिल्क की साड़ियां ग्राहकों को महज 2200 से 2300 रुपये के आसपास आसानी से मिल रही हैं।

फरवरी मेले का पुराना अनुभव और दिवाली मेले से उम्मीदें

पूजा सूरजकुंड के हस्तशिल्प आयोजनों के लिए कोई नया नाम नहीं हैं। वह हर साल सूरजकुंड में आयोजित होने वाले प्रसिद्ध फरवरी मेले में नियमित रूप से अपना स्टॉल लगाती आई हैं, जहां उन्हें हमेशा बहुत शानदार बिक्री और ग्राहकों का अच्छा प्रतिसाद मिलता है।

हालांकि, सूरजकुंड के दिवाली मेले में वह पहली बार अपनी साड़ियों का कलेक्शन लेकर पहुंची हैं। उन्होंने बताया कि मेले का अभी पहला दिन है और अभी तीन दिन का समय बाकी है। उन्हें पूरी उम्मीद है कि आने वाले दिनों में त्यौहारी खरीदारी के चलते उनके स्टॉल पर बिक्री में और भी बड़ा उछाल देखने को मिलेगा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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