भारत
4 घंटे पहले
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वोटर लिस्ट और चुनाव आयोग की भूमिका
भारत में चुनाव प्रक्रिया के दौरान अक्सर मतदाता सूची से नाम हटाने और वोट चोरी होने जैसे आरोप लगते रहे हैं। विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए विशेष गहन संशोधन यानी एसआईआर (SIR) को इन विवादों का मुख्य कारण बताती हैं। ईवीएम के साथ ही वोटर लिस्ट में हेरफेर की खबरें भी चर्चा का विषय बनी रहती हैं। हालांकि, भारत निर्वाचन आयोग इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा है। चुनाव आयोग का स्पष्ट कहना है कि ऑनलाइन माध्यमों या किसी विशेष सॉफ्टवेयर के इस्तेमाल से किसी भी मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से नहीं हटाया जा सकता। आयोग के अनुसार, पोर्टल और ऐप्स केवल आवेदन जमा करने की सुविधा देते हैं, जिसके बाद हर मामले की गहन जांच की जाती है। आयोग ने इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी मतदाता को नोटिस जारी किए बिना और उसे अपना पक्ष रखने का मौका दिए बिना उसका नाम सूची से हटाना कानूनी रूप से असंभव है।
वोटर लिस्ट से नाम हटाने के कानूनी नियम
मतदाता सूची में नाम दर्ज करने या हटाने की पूरी प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत निर्धारित की गई है। इस ढांचे का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी नागरिक के साथ अन्याय न हो और उसका वोट उसकी सहमति या कानूनी प्रक्रिया के बिना न छिने। इन नियमों के तहत दुरुपयोग को रोकने के लिए पुख्ता सुरक्षा उपाय किए गए हैं ताकि प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रहे।
प्रक्रिया और फॉर्म 7 का उपयोग
यदि कोई नागरिक अपना नाम मतदाता सूची से हटवाना चाहता है या किसी अन्य प्रविष्टि पर आपत्ति जताना चाहता है, तो उसे प्रपत्र 7 भरना होता है। इसे निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी यानी ईआरओ (ERO) के पास जमा करना आवश्यक है। यह फॉर्म तब भी इस्तेमाल किया जाता है जब कोई मतदाता दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में शिफ्ट हो गया हो। इस फॉर्म में निर्वाचन क्षेत्र का नाम, मतदाता का ईपीआईसी नंबर (EPIC Number), नाम हटाने का कारण और आवेदक की व्यक्तिगत जानकारी व हस्ताक्षर अनिवार्य हैं। इसे जमा करने के बाद संबंधित बूथ स्तरीय अधिकारी यानी बीएलओ (BLO) आवेदक को पावती रसीद प्रदान करते हैं।
नाम हटाने की शर्तें और सत्यापन
किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से तभी हटाया जा सकता है जब वह स्थायी रूप से दूसरे निर्वाचन क्षेत्र में चला गया हो, उसके पते पर वह न मिल रहा हो, दो बार नाम दर्ज हो गया हो, उसकी मृत्यु हो गई हो या वह भारतीय नागरिक न रहा हो। राजनीतिक या मनमाने कारणों से नाम हटाने की कोई गुंजाइश नहीं है। हर आवेदन का रिकॉर्ड रखा जाता है और अधूरा होने पर उसे शुरुआती स्तर पर ही खारिज कर दिया जाता है। नाम हटाने का प्रस्ताव आने पर ईआरओ (ERO) को संबंधित मतदाता को नोटिस भेजना होता है। इसमें सुनवाई की तिथि, समय और स्थान का उल्लेख होना अनिवार्य है। यह नोटिस व्यक्तिगत रूप से, पंजीकृत डाक द्वारा या घर पर चस्पा करके दिया जा सकता है। इसके बाद बीएलओ (BLO) मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन करते हैं कि क्या मतदाता सच में वहां नहीं रह रहा है या उसकी मृत्यु हो चुकी है। इन साक्ष्यों के आधार पर ही ईआरओ (ERO) नाम हटाने या बनाए रखने का निर्णय लेते हैं। इस दौरान दोनों पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अधिकार होता है।
गलत जानकारी देने पर दंड
यदि कोई व्यक्ति प्रपत्र 7 में जानबूझकर गलत जानकारी देता है, तो वह लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 31 के तहत दंडनीय अपराध माना जाता है। किसी का नाम गलत तरीके से हटवाना कानूनी रूप से अपराध है। यदि किसी मतदाता का नाम गलती से हटा दिया गया है, तो वह ईआरओ (ERO) के आदेश के विरुद्ध अपील कर सकता है और पहचान व निवास प्रमाण के साथ प्रपत्र 6 भरकर अपना नाम दोबारा दर्ज करवाने के लिए आवेदन दे सकता है।
क्या सॉफ्टवेयर के जरिए नाम हटाना संभव है?
तकनीकी रूप से यह समझना आवश्यक है कि ऑनलाइन पोर्टल केवल आवेदनों को स्वीकार करने का माध्यम हैं। वे खुद से नाम हटाने का कार्य नहीं करते। किसी भी मामले में सत्यापन और सुनवाई अनिवार्य है। यदि कोई सॉफ्टवेयर के जरिए बड़े पैमाने पर हेरफेर का प्रयास करता है, तो यह सीधे तौर पर धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश माना जाएगा। सॉफ्टवेयर सिस्टम आवेदनों की बाढ़ ला सकता है, लेकिन वह अपने आप रिकॉर्ड से नामों को मिटा नहीं सकता। भारत में मतदाता का नाम हटाना एक क्लिक का काम नहीं है, बल्कि यह एक व्यवस्थित कानूनी प्रक्रिया है।
ERONET और ECINET क्या हैं?
भारत निर्वाचन आयोग ने वोटर लिस्ट को आधुनिक बनाने के लिए ERONET और ECINET का विकास किया है। ERONET यानी इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स नेटवर्क एक केंद्रीकृत वेब-आधारित प्रणाली है, जिसे विशेष रूप से मतदाता सूचियों के प्रबंधन के लिए बनाया गया था। इसके जरिए नए नाम जोड़ने, विवरणों में सुधार करने और नाम हटाने का काम डिजिटल तरीके से होता है। इसने देश के विभिन्न राज्यों की 36 अलग-अलग प्रणालियों को एक साझा डिजिटल ढांचे में लाकर एकीकृत कर दिया है।
वहीं, ECINET एक व्यापक प्लेटफॉर्म है, जिसमें ERONET की सेवाओं के साथ-साथ चुनाव आयोग की 40 से अधिक अन्य सेवाएं और पोर्टल शामिल किए गए हैं। यह मतदाताओं, उम्मीदवारों और दलों के लिए एक वन-स्टॉप समाधान है, जहां से वे पंजीकरण, आवेदन ट्रैकिंग, ई-एपिक (e-EPIC) डाउनलोड और चुनावी आंकड़े देख सकते हैं।
कैसे काम करती है यह प्रणाली?
इन तमाम तकनीकी सुधारों के बावजूद न तो ERONET और न ही ECINET के पास खुद से किसी का नाम हटाने का कानूनी अधिकार है। यह सॉफ्टवेयर केवल एक डिसीजन-सपोर्ट सिस्टम की तरह कार्य करता है, जो डेटा में विसंगतियों या संभावित डुप्लिकेट एंट्री की पहचान करता है। इसके आधार पर फील्ड स्टाफ भौतिक सत्यापन करता है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 15 के तहत, अंतिम निर्णय हमेशा स्थानीय इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर के पास होता है, जो पूरी जांच के बाद ही कोई औपचारिक आदेश जारी करता है।
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