क्या एआई और रोबोट के दौर में स्कूल की अहमियत खत्म हो रही है? समझिए नई पीढ़ी की शिक्षा का सच करियर 4 घंटे पहले 2
तकनीक के बढ़ते प्रभाव के बीच यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या घर बैठे एआई से पढ़ाई करना स्कूलों के विकल्प की जगह ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि किताबी ज्ञान से इतर मानवीय मूल्यों और सामाजिक विकास के लिए स्कूल आज भी अपरिहार्य हैं।

एआई के दौर में शिक्षा का स्वरूप

आज का युग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई का है। हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से लेकर कार्यस्थलों के बड़े प्रोजेक्ट्स तक, तकनीक ने अपना प्रभाव गहरा कर दिया है। बच्चों की दुनिया भी इससे अछूती नहीं है। आज के विद्यार्थी एक क्लिक के माध्यम से कोडिंग से लेकर जटिल विषयों तक का समाधान पल भर में पा लेते हैं। एआई ने सीखने की प्रक्रिया को सरल बना दिया है, लेकिन क्या इसने शिक्षा के मूल उद्देश्य को बदल दिया है? क्या रोबोट या स्क्रीन कभी उस अनुभव की जगह ले सकते हैं जो एक बच्चा क्लासरूम में अपने साथियों के बीच बैठकर हासिल करता है? आज कई अभिभावक इस उलझन में हैं कि क्या घर बैठे तकनीक के जरिए पढ़ाई बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पर्याप्त है। शिक्षा केवल किताबी ज्ञान रटकर अंक हासिल करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की कला है। संस्कृति ग्रुप ऑफ स्कूल्स के ट्रस्टी प्रणीत मुंगाली का मानना है कि हालांकि तकनीक शिक्षा के मार्ग को सुगम बना सकती है, लेकिन नैतिकता, संवेदना और सामाजिक समझ विकसित करने का कार्य केवल स्कूल और शिक्षक ही कर सकते हैं।

प्रैक्टिकल नॉलेज का कोई विकल्प नहीं

स्कूल में बच्चा केवल किताबों के पन्ने नहीं पलटता, बल्कि वह व्यावहारिक जीवन के असली सबक सीखता है। वैदिक काल से चली आ रही गुरु शिष्य परंपरा इस सत्य का प्रमाण है कि ज्ञान महज सूचना का संग्रह नहीं है, बल्कि उसे जीवन में ढालना है। एआई के पास दुनिया भर का डेटा मौजूद हो सकता है, लेकिन उसके पास मानवीय संवेदनाएं नहीं हैं। कक्षा में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच एक भावनात्मक रिश्ता बनता है, जो बच्चे को समाज में उठने बैठने, बड़ों का सम्मान करने और छोटों के प्रति प्रेम का भाव सिखाता है। यह व्यवहारिक शिक्षा किसी भी सॉफ्टवेयर में डाउनलोड नहीं की जा सकती। इसे केवल स्कूल के वातावरण और दोस्तों के साथ बिताए गए समय से ही सीखा जा सकता है।

टीम वर्क और नेतृत्व क्षमता का विकास

अक्सर देखा गया है कि स्क्रीन और गैजेट्स पर अत्यधिक निर्भरता बच्चों को अकेलेपन और निष्क्रियता की ओर ले जा रही है। इसके विपरीत, विद्यालय का परिवेश बच्चों को मिलजुल कर रहना सिखाता है। जब बच्चे खेल के मैदान में उतरते हैं, वार्षिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भागीदारी करते हैं या समूह परियोजनाओं पर मिलकर काम करते हैं, तो उनमें नेतृत्व करने की क्षमता का उदय होता है। वे टीम के साथ काम करना सीखते हैं, अपनी जवाबदेही को समझते हैं और एक दूसरे की भावनाओं का आदर करना सीखते हैं। यह आत्मविश्वास और जीवन की चुनौतियों को सहने का धैर्य किसी एल्गोरिदम से नहीं, बल्कि वास्तविक जीवन के अनुभवों और चुनौतियों का सामना करने से ही प्राप्त होता है।

नई शिक्षा नीति और तकनीक का संतुलन

इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हमें तकनीक से दूरी बना लेनी चाहिए। नई शिक्षा नीति 2020 भी स्पष्ट करती है कि एआई और डिजिटल तकनीक का उपयोग शिक्षा को अधिक सुलभ बनाने के लिए किया जाना चाहिए, विशेष रूप से देश के दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों और दिव्यांगों तक पहुँचने के लिए। तकनीक एक बेहतरीन उपकरण या सहायक जरूर है, लेकिन इसे कभी भी शिक्षा का मुख्य केंद्र या मास्टर नहीं बनना चाहिए। यदि हम पूर्णतः तकनीक पर निर्भर हो गए, तो बच्चों की सोचने की मौलिक क्षमता और रचनात्मकता पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए अभिभावकों और शिक्षकों को यह समझना होगा कि तकनीक को एक मददगार साथी के रूप में अपनाएं, लेकिन बच्चों के संपूर्ण विकास के लिए स्कूल और मानवीय मूल्यों का साथ कभी न छोड़ें।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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