भिलाई स्टील प्लांट की गौरवगाथा: रूस के साथ से शुरू हुआ सफर, जहां बनी पटरियों से चांद तक पहुंच सकती है ट्रेन छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 6
छत्तीसगढ़ के भिलाई स्टील प्लांट ने भारतीय रेलवे के लिए इतने किलोमीटर लंबे ट्रैक तैयार किए हैं कि उनसे चांद तक पटरियां बिछाई जा सकती हैं। इस्पात मंत्रालय ने इस ऐतिहासिक संयंत्र की बिक्री से जुड़ी अफवाहों को पूरी तरह खारिज किया है।

अफवाहों के बीच फिर चर्चा में आया भिलाई स्टील प्लांट

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में स्थित ऐतिहासिक भिलाई स्टील प्लांट एक बार फिर सुर्खियों में है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में इस संयंत्र के बेचे जाने को लेकर कई तरह के दावे किए जा रहे थे। हालांकि, केंद्र सरकार के इस्पात मंत्रालय ने इन तमाम खबरों पर विराम लगाते हुए स्थिति पूरी तरह साफ कर दी है। मंत्रालय ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से बयान जारी कर स्पष्ट किया कि प्लांट को बेचने के दावे पूरी तरह से निराधार और भ्रामक हैं। इसके साथ ही सरकार ने आम लोगों और कर्मचारियों से इस प्रकार की अफवाहों पर बिल्कुल भी ध्यान न देने की अपील की है।

धरती से चांद तक पटरियां बिछाने का अनोखा कीर्तिमान

भिलाई स्टील प्लांट केवल एक औद्योगिक कारखाना नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत की प्रगति का एक बड़ा प्रतीक है। इस प्लांट में बनी रेलवे पटरियों की कुल लंबाई इतनी ज्यादा है कि अगर उन्हें आपस में जोड़ दिया जाए, तो ट्रेन सीधे पृथ्वी से चंद्रमा तक पहुंच सकती है। चांद तक पटरियां बिछाने के बाद भी लाखों किलोमीटर लंबा ट्रैक शेष बच जाएगा।

आधिकारिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, 21 फरवरी 2020 को इस्पात मंत्रालय ने जानकारी साझा की थी कि यह संयंत्र अब तक लगभग 5 लाख किलोमीटर लंबे रेलवे ट्रैक का निर्माण पूरा कर चुका है। खगोलीय आंकड़ों के अनुसार पृथ्वी से चंद्रमा की औसतन दूरी लगभग 3 लाख 84400 किलोमीटर है। इस लिहाज से भिलाई में बनी पटरियां न केवल चांद तक का रास्ता तय कर सकती हैं, बल्कि उनसे पूरी पृथ्वी के 13 बार चक्कर भी लगाए जा सकते हैं।

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ नाम

संयंत्र के नाम यह ऐतिहासिक उपलब्धि नई नहीं है। इससे पहले भी जब भिलाई स्टील प्लांट ने धरती के 7 बार चक्कर लगाने के बराबर रेलवे पटरियों का निर्माण किया था, तब इसका नाम प्रतिष्ठित गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया था। इस अभूतपूर्व सफलता को यादगार बनाए रखने के लिए शहर के सेक्टर-10 में एक प्रसिद्ध रेल चौक बनाया गया था, जो आज भी इस संयंत्र की क्षमता और गौरव का गवाह बना हुआ है।

सोवियत संघ का सहयोग और भारत का सपना

आजादी के बाद जब भारत के सामने देश के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की बड़ी चुनौती थी, तब इस सपने को साकार करने के लिए कदम आगे बढ़ाया तत्कालीन सोवियत संघ (रूस) ने। भारत की पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत एक आधुनिक स्टील प्लांट स्थापित करने की योजना तैयार की गई। इसके लिए फरवरी 1955 में दिल्ली में भारत सरकार और सोवियत संघ के बीच एक ऐतिहासिक करार हुआ था। गहन अध्ययन के बाद छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के भिलाई स्थान को इस संयंत्र के लिए चुना गया।

जब पहली बार भट्टी से निकला पिघला हुआ लोहा

संयंत्र की स्थापना का कार्य तेजी से शुरू हुआ और 4 फरवरी 1959 का दिन भारतीय उद्योग जगत में मील का पत्थर साबित हुआ। इसी दिन देश के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भिलाई स्टील प्लांट की पहली ब्लास्ट फर्नेस यानी भट्टी का औपचारिक उद्घाटन किया। जैसे ही भट्टी चालू हुई, उससे पहली बार पिघला हुआ लोहा बाहर आया और भारत के औद्योगिक पुनर्जागरण की शुरुआत हुई।

भारतीय रेलवे की मुख्य रीढ़ और मौजूदा स्थिति

अपनी शुरुआत से लेकर आज तक यह संयंत्र भारतीय रेलवे की जीवनरेखा बना हुआ है। एशिया के सबसे बड़े स्टील प्लांट्स में शुमार यह कारखाना देश के परिवहन तंत्र को मजबूती प्रदान करता है। हालांकि मौजूदा दौर में निजी क्षेत्र की स्टील कंपनियां भी रेलवे पटरियों का निर्माण करने लगी हैं, लेकिन आज भी भारतीय रेलवे अपनी कुल ट्रैक आवश्यकता का 90 प्रतिशत हिस्सा इसी भिलाई स्टील प्लांट से प्राप्त करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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