थार के तपते रेगिस्तान में संजीवनी बनीं सदियों पुरानी बेरियां, जल संकट से निपटने के लिए शुरू हुई खास मुहिम राजस्थान एक घंटा पहले 2
बाड़मेर के रेगिस्तानी इलाकों में पारंपरिक जल स्रोतों यानी बेरियों को पुनर्जीवित करने का काम जोरों पर है, जिससे भीषण गर्मी में ग्रामीणों और वन्यजीवों को बड़ी राहत मिल रही है।

रेगिस्तान में फिर लहलहा रही जल संस्कृति

राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित थार के मरुस्थल में इस बार भीषण गर्मी और पानी की किल्लत के बीच एक अनूठी पहल ने उम्मीद की नई किरण जगाई है। सदियों से चले आ रहे पारंपरिक जल स्रोत, जिन्हें स्थानीय भाषा में बेरियां कहा जाता है, उन्हें अब फिर से नया जीवन दिया जा रहा है। ये बेरियां न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि रेगिस्तान में रहने वाले बेजुबान वन्यजीवों के लिए भी पानी का प्रमुख जरिया हैं।

मुहिम का विस्तार और लक्ष्य

इस संरक्षण अभियान की बागडोर पर्यावरण प्रेमी नरपतसिंह राजपुरोहित और जयेश कुमार लालका ने संभाली है। इस मुहिम का मुख्य केंद्र उन इलाकों को बनाना है जहाँ जल संकट सबसे अधिक है। अभियान के तहत पुरानी बेरियों की न केवल सफाई की जा रही है, बल्कि उनकी मरम्मत और पुनर्निर्माण का काम भी किया जा रहा है। योजना के अनुसार, इस कार्य को बड़े स्तर पर ले जाते हुए वर्ष 2026-27 तक कई अन्य गांवों में भी इसे विस्तार दिया जाएगा।

जल संरक्षण की सदियों पुरानी विरासत

इस पहल का सबसे बड़ा उद्देश्य भविष्य की जल सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। आधुनिक दौर में जब जल स्रोतों की कमी हो रही है, तब थार की यह प्राचीन जल संरक्षण तकनीक एक मिसाल बनकर उभरी है। इन बेरियों के पुनर्जीवित होने से सालभर पानी की उपलब्धता बनी रहेगी, जिससे न केवल गांवों की प्यास बुझेगी, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र को भी मजबूती मिलेगी।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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