बलूचिस्तान का इतिहास सिर्फ़ एक भूभाग का नहीं, बल्कि उन लाखों इंसानों का है जो दशकों से हत्या, अनैतिक कृत्यों, अपहरण, अत्याचार, हिंसा, खनिज लूट, विस्थापन और अपनों को खोने का दंश झेलते आ रहे हैं। हर आँकड़े के पीछे एक परिवार, एक माँ, एक पिता और एक बच्चा छिपा है जिसने अपना कोई करीबी गँवाया है। यह 77 साल की कहानी दर्द, संघर्ष और अंतहीन इंतज़ार से भरी हुई है।
जानें गईं, मगर सही गिनती अब तक नहीं
बलोच सूत्रों के अनुसार, 1948 से लेकर अब तक करीब 2.5 लाख बलोचों की जान जा चुकी है। हालाँकि इस त्रासदी का ठीक-ठीक आँकड़ा आज तक सामने नहीं आ पाया है। सूत्रों ने इसकी एक बड़ी वजह यह बताई कि बलूचिस्तान के कई दूरदराज़ और दुर्गम इलाकों तक पाकिस्तान सरकार और सेना ने वर्षों तक स्वतंत्र पहुँच और निष्पक्ष दस्तावेज़ीकरण को सीमित रखा, जिसके चलते असली हालात दुनिया के सामने नहीं आ सके और कोई ठोस रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। उनका मानना है कि मौतों की वास्तविक संख्या उपलब्ध दावों से कहीं ज़्यादा हो सकती है।
40 हज़ार से ज़्यादा लोगों को जबरन उठाया गया
सिर्फ़ मौतें ही नहीं, बल्कि हज़ारों परिवार अपने प्रियजनों के गायब हो जाने का दर्द भी ढो रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक 1948 से अब तक करीब 40,000 से अधिक लोगों को जबरन अगवा किया गया। उनके अनुसार ये वे लोग नहीं हैं जो अचानक लापता हो गए, बल्कि इन्हें पाकिस्तानी सेना और आईएसआई ने अलग-अलग अभियानों और छापों के दौरान उठाया।
- कई लोगों को उनके घरों और गाँवों में छापेमारी के दौरान हिरासत में लिया गया।
- कुछ को सार्वजनिक परिवहन से उतारकर ले जाया गया।
- अनेक छात्रों को विश्वविद्यालयों और छात्रावासों से उठाया गया।
- डॉक्टरों तक को उनके क्लीनिक और अस्पतालों से उठा लिया गया।
इन लोगों को गुप्त हिरासत केंद्रों और यातना शिविरों में रखा गया। बीते वर्षों में ऐसे हज़ारों लोगों की मौत हो गई और बाद में उनके शव सड़कों के किनारे या बलूचिस्तान के अलग-अलग इलाकों में मिले। इनमें से कई का आज तक कोई अता-पता नहीं है। हज़ारों परिवार आज भी नहीं जानते कि उनके बेटे, भाई या पिता ज़िंदा भी हैं या नहीं।
10 लाख लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर
बलूचिस्तान का संकट केवल जान-माल के नुकसान तक सीमित नहीं है। करीब 10 लाख लोगों को अपना घर-बार छोड़कर विस्थापित होना पड़ा। बहुत से परिवार वर्षों से अस्थायी ज़िंदगी जीने को मजबूर हैं और अपने ही इलाके में शरणार्थियों जैसा जीवन बिता रहे हैं। कई लोगों ने तो वर्षों से अपना गाँव, खेत और पुश्तैनी घर तक नहीं देखा।
स्थिति की गंभीरता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बलोच सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान सरकार ने वर्ष 2025 में जनवरी से दिसंबर के बीच 90,000 खुफ़िया-आधारित सुरक्षा ऑपरेशन किए जाने की बात स्वीकार की थी। यदि हर ऑपरेशन में औसतन 5 लोगों को हिरासत में लिया गया हो, तो यह संख्या एक साल में करीब 3.6 लाख लोगों तक पहुँच जाती है। यह आँकड़ा बलोच समाज में फैले भय की गहराई को बयाँ करता है।
महिलाओं की पीड़ा का कोई आँकड़ा नहीं
सूत्रों के अनुसार महिलाओं की पीड़ा का कोई स्पष्ट आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, और यौन हिंसा एवं उत्पीड़न के मामलों की संख्या हज़ारों में हो सकती है। माताओं से उनके बच्चे, पति, भाई और बहन तक छीन लिए गए। सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों से अधिकांश परिवार ऐसे मामलों को सार्वजनिक नहीं करते, यही वजह है कि हज़ारों मामलों के दावों के बावजूद असली तस्वीर सामने नहीं आ पाती।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2019 में एक ऐसा मामला सामने आया जिसने पूरे बलोच समाज को हिला दिया। क्वेटा स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ बलूचिस्तान में कथित रूप से छात्राओं की निगरानी के लिए गुप्त सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे। रिपोर्टों के मुताबिक बाथरूम और हॉस्टल जैसे निजी स्थानों से करीब 5,000 वीडियो रिकॉर्ड किए गए थे। इस घटना के बाद बड़ी संख्या में छात्राओं ने पढ़ाई छोड़ दी और कई परिवारों ने अपनी बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए भेजना ही बंद कर दिया।
शिक्षा में पिछड़ापन और बेटियों की दूरी
बलूचिस्तान पहले से ही शिक्षा के मामले में पाकिस्तान के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता है, और ऐसी घटनाओं ने महिलाओं की शिक्षा को और बड़ा झटका दिया। संयुक्त राष्ट्र की 2022 की एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे गरीब प्रांत बलूचिस्तान शिक्षा के लिए ज़रूरी मानव और वित्तीय संसाधनों की भारी कमी से जूझ रहा है। हालाँकि 2014 का बलूचिस्तान अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 5 से 16 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए शिक्षा को मुफ़्त और अनिवार्य बनाता है, फिर भी 78 प्रतिशत लड़कियाँ स्कूल से बाहर हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक प्राथमिक स्तर पर लड़कियों का नेट इनटेक रेट केवल 35 प्रतिशत है, जबकि लड़कों का यह आँकड़ा 66 प्रतिशत है। बड़ी संख्या में लड़कियाँ तभी स्कूल जा पाती हैं जब स्कूल उनके घर के नज़दीक हो। पूरे प्रांत में सिर्फ़ 26 प्रतिशत प्राथमिक स्कूल, 42 प्रतिशत लोअर सेकेंडरी स्कूल और 36 प्रतिशत अपर सेकेंडरी स्कूल ही लड़कियों के लिए हैं। इसके अलावा पानी और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी भी किशोरावस्था में लड़कियों के स्कूल छोड़ने की एक बड़ी वजह बनती है। ऐसे में 2019 के सीसीटीवी विवाद के बाद बड़ी संख्या में छात्राओं के पढ़ाई छोड़ने ने महिला शिक्षा को और पीछे धकेल दिया।
एक ट्रिलियन डॉलर की खनिज संपदा, फिर भी जनता बदहाल
बलूचिस्तान प्राकृतिक संसाधनों के मामले में बेहद समृद्ध माना जाता है। यहाँ की खनिज संपदा का अनुमानित मूल्य 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर आँका जाता है। सूत्रों के अनुसार जिस ज़मीन पर सोना, गैस और दूसरी प्राकृतिक संपदाएँ मौजूद हैं, वहीं बड़ी संख्या में लोग आज भी असुरक्षा और संघर्ष के बीच जीवन बिता रहे हैं, जबकि इन संसाधनों का लाभ स्थानीय लोगों तक नहीं पहुँचता।
उन्होंने बताया कि बलूचिस्तान में कोयला, सल्फर, क्रोमाइट, लौह अयस्क, बैराइट, संगमरमर, क्वार्टज़ाइट और चूना पत्थर प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, साथ ही यहाँ तेल के भी अहम भंडार हैं। बलूचिस्तान का रेको डिक खदान क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े अविकसित तांबा और सोना भंडारों में से एक माना जाता है, जहाँ करीब 5.9 अरब टन तांबा और सोने के भंडार होने का अनुमान है। वर्ष 1953 में डेरा बुगटी के सुई क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की खोज हुई थी, और तब से पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में गैस की आपूर्ति होती आ रही है।
ग्वादर, चीन और रणनीतिक परियोजनाएँ
सूत्रों के अनुसार पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के ग्वादर और अन्य तटीय इलाकों को चीन की मौजूदगी वाले एक बड़े रणनीतिक क्षेत्र के रूप में विकसित किया है। वर्ष 2017 में ग्वादर बंदरगाह को 40 वर्षों की लीज़ पर चीन समर्थित कंपनी China Overseas Port Holding Company को सौंपा गया था। इसके बाद चीन ने बंदरगाह के विकास, 300 मेगावाट के कोयला आधारित बिजली संयंत्र और 23 करोड़ डॉलर की लागत वाले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे समेत कई परियोजनाओं में निवेश किया। जिवानी, सोनमियानी और दूसरे इलाकों में नए सैन्य ठिकाने बनाए जा रहे हैं, जिनके कारण स्थानीय बलोच लोग अपनी ज़मीन और रोज़गार खो रहे हैं।
वर्ष 1993 में चीन ने पाकिस्तान को M-9 और M-11 मिसाइलें मुहैया कराईं और इसके बदले चीन की सरकारी कंपनी Metallurgical Corporation of China (MCC) को संसाधन संपन्न चागई क्षेत्र 20 साल की लीज़ पर दिया गया। इसके बाद कंपनी ने सैंडक और रेको डिक क्षेत्रों में सोना और तांबा भंडारों की पहचान की। MCC वर्ष 2002 से सोना और तांबा खनन कर रही थी, और इस दौरान हर साल करीब 25 टन सोना तथा 12,000 से 15,000 टन तांबे का उत्पादन हुआ। खनन से होने वाले लाभ में से 50 प्रतिशत हिस्सा कंपनी को मिला, 48 प्रतिशत पाकिस्तान की संघीय सरकार के पास गया, जबकि बलूचिस्तान को महज़ 2 प्रतिशत हिस्सा मिला।
CPEC और लूट के आरोप
बलोच कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार संगठनों ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) परियोजना का विरोध करते हुए इसे बलूचिस्तान की प्राकृतिक संपदा की लूट करार दिया है। उनका आरोप है कि इन परियोजनाओं में स्थानीय बलोच लोगों को रोज़गार और विकास के अवसरों से दूर रखा गया और कई जगह निर्माण कार्यों के लिए लोगों को उनकी ज़मीनों से हटाया गया।
CPEC चीन और पाकिस्तान के बीच एक बड़ी परियोजना है, जिसमें करीब 3,000 किलोमीटर लंबा सड़क, रेल और पाइपलाइन नेटवर्क शामिल है। इसका मकसद चीन, पाकिस्तान और क्षेत्र के अन्य देशों के बीच व्यापार को बढ़ावा देना है। यह परियोजना चीन के शिनजियांग क्षेत्र को पाकिस्तान के ग्वादर और कराची बंदरगाहों से जोड़ती है। CPEC की आधिकारिक शुरुआत 20 अप्रैल 2015 को हुई थी, जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 46 अरब डॉलर मूल्य के 51 समझौतों और सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर किए थे।
सवाल वही, जवाब आज भी अधूरा
77 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी बलूचिस्तान का सबसे बड़ा सवाल वही है — कितने लोग मारे गए, कितने लापता हैं और कितने परिवार आज भी अपने प्रियजनों के लौटने की राह देख रहे हैं? शायद इसका सटीक जवाब किसी के पास नहीं है। लेकिन इतना तय है कि बलूचिस्तान की यह दास्तान महज़ आँकड़ों की नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे दर्द, भय और बिछड़ने की कहानी है।
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