खरगोन में ताजियों का कारवां
मध्य प्रदेश के खरगोन शहर में मोहर्रम की 11वीं तारीख पर अकीदत और परंपरा का अनूठा संगम देखने को मिला। शनिवार की शाम को शहर के विभिन्न इलाकों से 40 से अधिक भव्य और सुंदर नक्काशीदार ताजिए विसर्जन के लिए रवाना हुए। ये ताजिए शहर के प्रमुख मार्गों से होते हुए कुंदा नदी के तट पर स्थित कर्बला के मैदान तक पहुंचे। पूरे शहर में या हुसैन के नारों की गूंज रही और श्रद्धालुओं ने पूरी श्रद्धा के साथ ताजियों पर लोबान और रेवड़ी अर्पित कर जियारत की।
प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था
इस धार्मिक आयोजन को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए स्थानीय प्रशासन और पुलिस पूरी तरह मुस्तैद दिखाई दी। सुरक्षा के कड़े इंतजामों के तहत शहर में 500 से अधिक पुलिसकर्मियों और अधिकारियों को तैनात किया गया था। संवेदनशील इलाकों में विशेष सुरक्षा घेरा बनाया गया है और सीसीटीवी कैमरों के साथ ही ड्रोन से पूरे जुलूस मार्ग और कर्बला मैदान की चप्पे चप्पे पर निगरानी रखी जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि आयोजन को शांति और सौहार्दपूर्ण माहौल में पूरा करना उनकी प्राथमिकता है।
श्रद्धा और परंपरा का निर्वहन
जुलूस में शामिल होने वाले ताजियों में तलाई का बड़ा मन्नतों का ताजिया विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इसके अलावा रामेश्वर टॉकीज, इमामबाड़ा कुम्हारवाड़ा, अल्लाहवाला मार्ग और रंगरेजवाड़ी सहित कई मोहल्लों के ताजिए भी इस जुलूस का हिस्सा बने। 10 दिनों की इबादत और अकीदत के बाद शनिवार की शाम से शुरू हुआ यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा। कुंदा नदी तट स्थित कर्बला मैदान में विधिवत रूप से ताजियों को दफनाने की प्रक्रिया पूरी की गई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने मातम और अकीदत का इजहार करते हुए इमाम हुसैन की शहादत को याद किया।
मोहर्रम और आशूरा का महत्व
मोहर्रम इस्लामी हिजरी कैलेंडर का पहला महीना माना जाता है। यह महीना केवल नए साल की शुरुआत के रूप में नहीं, बल्कि इमाम हुसैन इब्न अली की शहादत की याद के रूप में भी मनाया जाता है। मोहर्रम की 10वीं तारीख, जिसे आशूरा कहा जाता है, का इस्लामिक इतिहास में विशेष महत्व है। सन 680 ईस्वी यानी 61 हिजरी में कर्बला के युद्ध के दौरान इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अन्याय और अत्याचार के खिलाफ जंग लड़ी थी। वे यज़ीद इब्न मुआविया के सामने झुकने के बजाय अपने सिद्धांतों पर अडिग रहे और शहीद हो गए। उनकी इस शहादत की याद में मुस्लिम समुदाय विशेष रूप से मोहर्रम के पहले दस दिनों तक शोक मनाता है और उनके त्याग को नमन करता है।
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