मानसून से पहले ही नोएडा में जलभराव का खतरा
नोएडा शहर में मानसून के आने से पहले प्रशासन की तैयारियों की पोल खुलती नजर आ रही है। शहर को जलभराव जैसी समस्याओं से बचाने के लिए जो नाला सफाई अभियान पहले ही पूरा हो जाना चाहिए था, वह इस बार लापरवाही की भेंट चढ़ गया है। जमीनी पड़ताल में सामने आया है कि शहर के अधिकांश इलाकों में नाले कचरे और प्लास्टिक जैसे फ्लोटिंग मैटेरियल से पूरी तरह चोक हो चुके हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि नालों का दूषित और बदबूदार पानी ओवरफ्लो होकर आसपास की ग्रीन बेल्ट में फैल रहा है। इससे न केवल हरियाली को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि भूजल के प्रदूषित होने का संकट भी पैदा हो गया है।
टेंडर प्रक्रिया में भारी चूक
नोएडा प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं क्योंकि नाला सफाई के मामले में इस बार निर्धारित समय सारिणी का पालन नहीं हुआ। आम तौर पर अप्रैल के महीने में ही सफाई के लिए टेंडर जारी कर दिए जाते हैं और 15 जून तक काम पूरा करने का लक्ष्य तय किया जाता है। हालांकि, इस साल प्राधिकरण समय पर टेंडर जारी करना ही भूल गया, जिसके कारण सफाई का पूरा अभियान ही पटरी से उतर गया। सूत्रों का कहना है कि जब मामला वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में आया, तब जाकर मई के अंतिम सप्ताह में आनन-फानन में शहर के दस वर्क सर्किलों के लिए एक-एक करोड़ रुपये के टेंडर जारी किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि टेंडर प्रक्रिया, दस्तावेजों की पड़ताल और कार्य आवंटन में ही लगभग 45 दिन का समय लग जाता है, ऐसे में मानसून से पहले सभी नालों की सफाई को पूरा कर पाना एक कठिन चुनौती है।
सेक्टर-105 में चिंताजनक स्थिति
शहर के सेक्टर-105 स्थित सीएनजी पंप के पास की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बनी हुई है। यहां नाले में गंदगी के अंबार के कारण पानी बाहर की ओर बह रहा है और सीधे ग्रीन बेल्ट में जमा हो रहा है। इसके चलते आसपास के वातावरण में भयंकर दुर्गंध फैली हुई है, जिससे स्थानीय लोगों का जीना दूभर हो गया है। ऐसा केवल इसी एक इलाके में नहीं, बल्कि शहर के कई हिस्सों में देखने को मिल रहा है। जानकारी के अनुसार, शहर के कुल 80 से 90 प्रतिशत नालों की सफाई का काम अभी भी अधूरी स्थिति में है, जबकि प्राधिकरण दावा कर रहा है कि 30 जून तक सब ठीक कर लिया जाएगा।
सफाई व्यवस्था का पूरा विवरण
नोएडा प्राधिकरण के पास शहर की सफाई व्यवस्था को लेकर विशाल बुनियादी ढांचा है, लेकिन मौजूदा सुस्ती ने इस पूरे तंत्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है। प्राधिकरण के अधीन आने वाली व्यवस्था का ब्यौरा कुछ इस प्रकार है:
- कुल नालों की संख्या: 153
- शाहदरा ड्रेन की लंबाई: 7.5 किलोमीटर
- कोंडली ड्रेन की लंबाई: 17.5 किलोमीटर
- शहरी क्षेत्र की नालियां: 700 किलोमीटर
- ग्रामीण क्षेत्र की नालियां: 2000 किलोमीटर
- मुख्य ड्रेन: 200 किलोमीटर
- सीवरेज नेटवर्क: 1500 किलोमीटर
जून का महीना खत्म होने को है, लेकिन इन विशाल नेटवर्क की सफाई का काम मात्र नाममात्र का हुआ है। यदि आने वाले दिनों में तेज बारिश होती है, तो इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहर की सड़कें किस कदर जलमग्न होंगी।
प्रशासनिक फेरबदल और नाकामयाबी
इस प्रशासनिक लापरवाही के पीछे की एक बड़ी वजह व्यवस्था में किया गया बदलाव भी माना जा रहा है। प्राधिकरण के सीईओ कृष्णा करुणेश ने जनवरी माह में जनस्वास्थ्य विभाग का सिविल विभाग के साथ विलय कर दिया था। इसका उद्देश्य सफाई व्यवस्था को अधिक प्रभावी और सुव्यवस्थित बनाना था। हालांकि, नई व्यवस्था में जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा न होने के कारण तालमेल की कमी दिखी और नाला सफाई का कार्य समय पर शुरू ही नहीं हो सका। अब सवाल यह है कि यदि मानसून ने दस्तक दी, तो क्या नोएडावासी एक बार फिर जलभराव का दंश झेलने को मजबूर होंगे। फिलहाल तो जमीनी हकीकत प्राधिकरण के सभी दावों को झुठलाती नजर आ रही है।
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