शैम्पू और साबुन से पहले क्या इस्तेमाल करती थीं महिलाएं? पुराने जमाने का यह हेयरवॉश था बेहद कारगर

आज के दौर में बालों की सफाई के लिए कई महंगे शैम्पू उपलब्ध हैं, लेकिन एक समय था जब लोग पूरी तरह से प्राकृतिक चीजों पर निर्भर थे। सुल्तानपुर की पुरानी परंपराओं में बालों को साफ करने के लिए एक विशेष मिट्टी का उपयोग किया जाता था, जिसे मुड़मिंजनी कहा जाता है।

आज के दौर में बालों की सफाई

मौजूदा समय में हमारी जीवनशैली पूरी तरह बदल चुकी है। बाजार में बालों की देखभाल के लिए सैकड़ों तरह के केमिकल युक्त शैम्पू, कंडीशनर और महंगे साबुन मौजूद हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब आधुनिक शैम्पू का आविष्कार नहीं हुआ था, तब लोग अपने बालों की गंदगी कैसे साफ करते थे? क्या वे केवल पानी से बाल धोते थे या फिर कोई खास नुस्खा अपनाया जाता था? आज हम आपको एक ऐसे ही पुराने और प्रभावी तरीके के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे आज की पीढ़ी शायद ही जानती हो।

क्या है मुड़मिंजनी मिट्टी?

सुल्तानपुर के ग्रामीण इलाकों में एक विशेष प्रकार की मिट्टी का चलन था, जिसे मुड़मिंजनी के नाम से जाना जाता था। स्थानीय निवासी और बुजुर्ग बजरंग बहादुर मिश्रा के अनुसार, यह कोई साधारण मिट्टी नहीं थी, बल्कि यह काली मिट्टी का एक खास रूप थी। करीब 30 साल पहले तक, यह मिट्टी घरों में शैम्पू की तरह इस्तेमाल की जाती थी। गांव के लोग इसे दूर-दूर से खोजकर लाते थे और गर्मियों के मौसम में विशेष रूप से इसका उपयोग बालों की सफाई के लिए किया जाता था। उस समय शैम्पू और साबुन की पहुंच नहीं होने के कारण, मुड़मिंजनी ही बालों को चमकाने और साफ करने का एकमात्र प्राकृतिक विकल्प हुआ करती थी। विशेष रूप से ग्रामीण महिलाएं इसे अपने बालों की धुलाई के लिए प्राथमिकता देती थीं।

बालों की सफाई के साथ मस्तिष्क को ठंडक

मुड़मिंजनी का उपयोग केवल बालों को साफ करने तक ही सीमित नहीं था। बजरंग बहादुर बताते हैं कि यह मिट्टी अपने तासीर में ठंडी होती थी। गर्मी के भीषण मौसम में, जब सिर की त्वचा चिपचिपी और गर्म हो जाती थी, तब यह काली मिट्टी किसी वरदान से कम नहीं थी। यह बालों से तेल और गंदगी को पूरी तरह खींच लेती थी और इसके साथ ही पूरे सिर को एक अद्भुत शीतलता प्रदान करती थी। उस दौर में यह महिलाओं के बीच गर्मियों का सबसे पसंदीदा हेयरकेयर रूटीन हुआ करता था।

इस्तेमाल करने की विधि

प्राचीन समय में लोग इसे लगाने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया का पालन करते थे। सबसे पहले, एक कटोरी में थोड़ी मात्रा में इस मिट्टी को लिया जाता था और उसमें हल्का पानी मिलाकर एक गाढ़ा लेप या पेस्ट तैयार किया जाता था। इस पेस्ट को पूरे सिर में अच्छी तरह से लगाया जाता था और लगभग 15 मिनट तक इसे बालों में रहने दिया जाता था। इसके बाद सामान्य या ठंडे पानी से बालों को अच्छी तरह धो लिया जाता था। इस विधि से बाल न केवल गंदगी से मुक्त होते थे, बल्कि मस्तिष्क को भी काफी राहत और ताजगी का अनुभव होता था।

समय के साथ लुप्त होता पारंपरिक ज्ञान

आज स्थिति काफी बदल चुकी है। गांव-गांव तक डिटर्जेंट, साबुन और आधुनिक शैम्पू की पहुंच ने इस प्राकृतिक तरीके को लगभग समाप्त कर दिया है। ग्रामीण बताते हैं कि अब मुड़मिंजनी का उपयोग खेती या अन्य कार्यों के लिए ही सीमित होकर रह गया है। बालों को धोने के लिए इसका इस्तेमाल अब बहुत कम हो गया है। हालांकि, सुल्तानपुर के कुछ सुदूर इलाकों, विशेषकर नदी के किनारे बसे गांवों में अभी भी कुछ उम्रदराज महिलाएं इस पारंपरिक तरीके का पालन करती हैं। मुड़मिंजनी का इतिहास हमें यह याद दिलाता है कि आधुनिकता की दौड़ में हमने प्रकृति द्वारा दिए गए कई प्रभावी और किफायती नुस्खों को पीछे छोड़ दिया है।

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