फरीदाबाद: कभी गन्ने की मिठास से महकता था यह गांव, आखिर क्यों किसानों ने हमेशा के लिए बदल ली अपनी खेती?

करीब 1000 साल पुराने ककड़ीपुर गांव में कभी गन्ने की बंपर पैदावार होती थी, लेकिन अब यहां के किसान धान और गेहूं पर सिमट कर रह गए हैं। किसानों का कहना है कि लागत अधिक और चीनी मिलों की बेरुखी के चलते उन्होंने गन्ने से तौबा कर ली है।

इतिहास और विरासत का संगम

फरीदाबाद जिले के अंतर्गत आने वाला ककड़ीपुर गांव अपने आप में एक गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है। यह गांव फतेहपुर बिल्लौच से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और पलवल जिले के पृथला विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आता है। कहा जाता है कि इस गांव की उम्र करीब 1000 साल पुरानी है। आज भी यह गांव अपने प्राचीन श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर, ऐतिहासिक कुएं और अपनी पारंपरिक कृषि शैली के लिए पूरे इलाके में पहचाना जाता है। हालांकि, समय की धारा के साथ गांव की खेती की तस्वीर पूरी तरह से बदल गई है। कभी यहां के खेतों में गन्ने की फसल लहलहाया करती थी, लेकिन अब यह इतिहास बन चुका है।

गन्ने से क्यों हुआ किसानों का मोहभंग

गांव के निवासी ललित कुमार के अनुसार, करीब 15 साल पहले तक ककड़ीपुर में बड़े पैमाने पर गन्ना, ज्वार, बाजरा और चने की खेती की जाती थी। धीरे-धीरे किसानों ने गन्ने की खेती से किनारा करना शुरू कर दिया। इसके पीछे कई ठोस कारण जिम्मेदार हैं। किसानों को चीनी मिलों से समय पर पर्ची नहीं मिल पा रही थी और फसल बेचने के बाद भुगतान के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता था। इसके अलावा खेती में मजदूरी की भारी कमी और मेहनत की तुलना में मिलने वाले बेहद कम दाम ने किसानों की कमर तोड़ दी।

खेती में बदलाव और लागत का गणित

ललित कुमार का कहना है कि गन्ने की एक एकड़ फसल उगाने में लगभग 35 से 38 हजार रुपये का खर्च आता था। गन्ना ऐसी फसल है जिसे एक बार लगाने पर वह दो साल तक खेत में बनी रहती है। लेकिन जब उचित लाभ नहीं मिला तो किसानों ने धान और गेहूं की खेती का सुरक्षित रास्ता चुन लिया। लगातार धान और गेहूं बोने के कारण जमीन की उर्वरता और स्वरूप में भी बदलाव आया है, जिसके कारण कभी मुख्य फसल रही चने की खेती अब लगभग लुप्त हो गई है। आज स्थिति यह है कि खाद, विशेषकर डीएपी और यूरिया की समय पर उपलब्धता न होने के कारण किसानों को कई बार ब्लैक में खाद खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

शिक्षा और बुनियादी सुविधाएं

ककड़ीपुर की कुल आबादी 1500 से 1600 के बीच है। गांव के बच्चों की शिक्षा के लिए फिलहाल यहां केवल पांचवीं कक्षा तक का सरकारी प्राथमिक विद्यालय ही उपलब्ध है। विद्यालय में बच्चों की संख्या कम होने के कारण इसे मिडिल या हाई स्कूल का दर्जा नहीं मिल सका है। इस वजह से गांव के अधिकांश बच्चों को अपनी आगे की पढ़ाई के लिए निजी स्कूलों की बस का सहारा लेकर नजदीकी इलाकों में जाना पड़ता है। गांव का बड़ा व्यापारिक केंद्र पलवल है, जबकि छोटी-मोटी खरीदारी के लिए ग्रामीण फतेहपुर बिल्लौच गांव के बाजार पर निर्भर रहते हैं।

परंपराओं को सहेजती संस्कृति

आधुनिकता के दौर में भी ककड़ीपुर ने अपनी पुरानी धरोहर को बचाकर रखा है। गांव में मौजूद 300 साल पुराना कुआं आज भी ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा का केंद्र है। कुआं पूजन और शादियों की रस्में आज भी उसी पारंपरिक तरीके से निभाई जाती हैं। वहीं, 200 साल पुराना श्री लक्ष्मीनारायण मंदिर गांव की आध्यात्मिक आस्था का प्रमुख स्तंभ है, जहां सभी ग्रामीण सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना के लिए जुटते हैं।

आजीविका और सामाजिक ताना-बाना

गांव की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि और पशुपालन पर टिकी है। रोजगार के सीमित साधनों के कारण युवा और कामगार पलवल, बल्लभगढ़, फरीदाबाद और दिल्ली तक काम की तलाश में जाते हैं। ककड़ीपुर में सभी जातियों का समावेश है, लेकिन ब्राह्मण समाज की बहुलता के कारण इसे ब्राह्मण बाहुल्य गांव के रूप में जाना जाता है। गांव का प्रमुख गोत्र मुद्गल है। यहां की खानपान शैली आज भी ठेठ हरियाणवी है, जिसमें दूध, दही और शुद्ध देसी भोजन को प्राथमिकता दी जाती है। हालांकि पहनावे में बदलाव आया है, जहां बुजुर्ग आज भी धोती-कुर्ता पहनना पसंद करते हैं, वहीं नई पीढ़ी पैंट-शर्ट और टी-शर्ट जैसे आधुनिक परिधानों में नजर आती है।

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