छतरपुर की उर्मिल नदी का त्रेतायुग से नाता, बहन सीता से मिलने नदी रूप में आई थीं उर्मिला; जानें लोकमान्यता

छतरपुर जिले की उर्मिल नदी का असली नाम उर्मिला नदी था और लोकमान्यता के अनुसार यह नदी माता सीता की छोटी बहन उर्मिला का रूप मानी जाती है, जिसका संबंध त्रेतायुग से जोड़ा जाता है।

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में केन और धसान जैसी बड़ी नदियों के साथ-साथ कई छोटी नदियां भी जिले के लिए जीवनदायिनी मानी जाती हैं। हर नदी का अपना अलग इतिहास और महत्व है। इन्हीं में से एक है उर्मिल नदी, जिसका जल न सिर्फ शहरों तक पहुंचाया जाता है, बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी वरदान साबित होता है।

इस नदी का नाम पहले उर्मिला नदी था, लेकिन समय के साथ नाम अपभ्रंश होकर उर्मिल नदी पड़ गया। लोकमान्यता है कि माता सीता की छोटी बहन उर्मिला इसी नदी का रूप धारण कर अपनी बहन से मिलने पहुंची थीं। इसी कारण इस नदी का संबंध त्रेतायुग से जोड़ा जाता है।

मां बंबरबैनी पहाड़ी के समीप बहती है नदी

मां बंबर बेनी समिति लवकुश नगर के उपाध्यक्ष मातादीन विश्वकर्मा बताते हैं कि छतरपुर जिले की उर्मिल नदी का वास्तविक नाम उर्मिला नदी था। यह नदी लवकुश नगर स्थित मां बंबरबैनी पहाड़ी के पास से होकर बहती है। मान्यता है कि वनवास के दौरान माता सीता ने इसी पहाड़ी पर निवास किया था।

इस पहाड़ी पर विराजमान देवी मां को वनदेवी के नाम से भी जाना जाता है। वर्षों से यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र बना हुआ है।

प्रतिदिन नदी में स्नान करती थीं माता सीता

लोककथा के अनुसार, वनवास में रह रहीं माता सीता को अपनी छोटी बहन उर्मिला की बहुत याद आती थी। बहन से मिलने के लिए उर्मिला ने नदी का रूप धारण कर लिया और इसी रूप में वे माता सीता के समीप पहुंचीं।

कहा जाता है कि माता सीता प्रतिदिन उर्मिला नदी में स्नान करती थीं और इसी बहाने अपनी बहन से मिलती थीं। यह मुलाकात दोनों बहनों के लिए अत्यंत सुखद और आत्मिक संतोष देने वाली होती थी।

चट्टान पर अंकित हैं प्रभु श्रीराम के चरण चिन्ह

मातादीन विश्वकर्मा आगे बताते हैं कि इस क्षेत्र में चरण पादुका सिंहपुर नामक स्थान भी है, जहां एक शहीद स्थल स्थित है। यहां एक चट्टान पर प्रभु श्रीराम के चरण चिन्ह बने हुए हैं और यह चट्टान भी उर्मिल नदी के किनारे है।

मान्यता है कि माता सीता प्रतिदिन उर्मिल नदी में स्नान के बाद प्रभु श्रीराम के चरणों के दर्शन करती थीं। आज भी उर्मिल नदी अपने जल से प्रभु श्रीराम के चरणों का स्पर्श करती है।

पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत हैं कथाएं

समय बीतने के साथ उर्मिला नदी का नाम अपभ्रंश होकर उर्मिल नदी हो गया, लेकिन इससे जुड़ी पौराणिक कथाएं आज भी स्थानीय लोगों के बीच जीवंत हैं। गांव के बड़े-बुजुर्ग आज भी बच्चों को इस पावन कथा से अवगत कराते हैं, जिससे नदी का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व बना हुआ है।

सूर्य भगवान को जल देने पर बने चरण चिन्ह

चरण पादुका स्थित राम-जानकी मंदिर के पुजारी सुरेश दास बताते हैं कि यह बहुत ही प्राचीन स्थान है। त्रेतायुग में जब भगवान श्री रामचंद्र चित्रकूट से वनवास के लिए दक्षिण दिशा की ओर बढ़ रहे थे, तब उन्होंने उर्मिल नदी में स्थित एक विशाल शिला पर खड़े होकर स्नान के बाद सूर्य भगवान को जल अर्पित किया था। उसी समय से इस शिला पर उनके चरण चिन्ह अंकित हो गए।

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