बहराइच का 'राम चावल': न मंडी का झंझट, न ग्राहक की तलाश — स्वाद और खुशबू से जीत रहा दिल

बहराइच के नवाबगंज की महिला किसान अनीता देवी जैविक तरीके से 'राम चावल' की खेती कर रही हैं, जिसकी मांग जिले से लेकर प्रयागराज तक है और जो ₹50 प्रति किलो के भाव में घर बैठे ही बिक जाता है।

बहराइच जिले के नवाबगंज क्षेत्र की एक महिला किसान ने खास किस्म के चावल की खेती शुरू की, जो अब जिले के साथ-साथ बाहर के लोगों को भी खूब भा रहा है। इस किस्म को 'राम चावल' के नाम से जाना जाता है। इस चावल से बनी खिचड़ी और तेहड़ी खाने में बेहद स्वादिष्ट लगती है और इसमें एक खास खुशबू भी बसी रहती है। अगर आप भी इस चावल का स्वाद चखना चाहते हैं तो आपको नवाबगंज ग्राम पंचायत के होलिया गांव पहुंचना होगा, जहां यह आसानी से मिल जाता है।

22 बीघे में खेती, बहराइच से प्रयागराज तक मांग

उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़कर अनीता देवी न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि अच्छा नाम भी कमा रही हैं। वे करीब 22 बीघा में राम चावल की खेती कर रही हैं, जिसकी मांग इतनी है कि बहराइच जिले के साथ-साथ प्रयागराज तक के लोग इसे पसंद कर रहे हैं।

इसकी खासियत यह है कि अनीता देवी इस चावल को रासायनिक कीटनाशकों से नहीं, बल्कि गाय के गोबर की खाद के सहारे जैविक तरीके से उगाती हैं। शायद यही वजह है कि लोगों को राम चावल इतना पसंद आ रहा है।

एक बीघा में पांच क्विंटल तक पैदावार

जैविक खेती से उत्पादन करने के बावजूद अनीता देवी अपने खेतों से प्रति बीघा 5 कुंटल तक पैदावार ले रही हैं। उनका कहना है कि जैविक तरीके से की जाने वाली खेती पूरी तरह जहर मुक्त होती है। ऐसी साग, सब्जी और अनाज में स्वाद भरपूर रहता है और आवश्यक फायदेमंद तत्व भी बने रहते हैं।

कैसे मिला खेती का विचार

अनीता देवी ने बताया कि एक बार गांव में एक कंपनी कई किस्मों के चावल लेकर आई थी, जिनमें राम चावल भी शामिल था। उन्होंने ट्रायल के तौर पर राम चावल के बीज लिए और पहले ही साल इसकी बुवाई की। उत्पादन अच्छा रहा और खाने में भी यह स्वादिष्ट लगा, जिसके बाद उन्होंने इसकी नियमित खेती शुरू कर दी।

उन्होंने बताया कि आज बाजार में यह चावल ₹50 प्रति किलो के भाव से बड़े आराम से बिक जाता है।

समूह से जुड़ने के बाद बदली तस्वीर

अनीता देवी के अनुसार, जब वे समूह से नहीं जुड़ी थीं, तब चावल का उत्पादन करने के बाद उसे मंडी ले जाना पड़ता था। मंडी में न तो अच्छा भाव मिलता था और ऊपर से किराया-भाड़ा भी लग जाता था। लेकिन जब से वे समूह से जुड़ी हैं, तब से चावल को कहीं ले जाने की जरूरत नहीं पड़ती — पूरी उपज घर से ही बिक जाती है।

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