राजद्रोह के आरोपी उमर खालिद को 'राष्ट्रवादी' बताने पर मचा घमासान, कांग्रेस नेता के बयान से शुरू हुआ विवाद

कर्नाटक कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बीके हरिप्रसाद द्वारा दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद को राष्ट्रवादी कहे जाने के बाद राजनीतिक गलियारों में बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस बयान की चौतरफा निंदा हो रही है और सवाल उठाए जा रहे हैं कि यूएपीए के तहत छह साल से जेल में बंद व्यक्ति का महिमामंडन क्यों किया जा रहा है।

राष्ट्रवादी बताने पर खड़ा हुआ बड़ा राजनीतिक विवाद

कर्नाटक कांग्रेस के प्रमुख नेता बीके हरिप्रसाद ने हाल ही में एक ऐसा विवादास्पद बयान दिया है जिसने देश की राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। बीके हरिप्रसाद ने खुले मंच से दिल्ली दंगों के मुख्य साजिशकर्ताओं में शामिल और पिछले छह वर्षों से जेल में बंद उमर खालिद को राष्ट्रवादी करार दिया है। इस बयान के बाद से न केवल विपक्षी दल बल्कि आम जनता के बीच भी तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। हरिप्रसाद ने एबीवीपी पर हमला बोलते हुए कहा कि उन्हें खालिद के बारे में बात करने का कोई नैतिक हक नहीं है, क्योंकि वे नाथूराम गोडसे को पूजते हैं। उन्होंने गोडसे को देश का पहला आतंकवादी तक करार दे दिया। हालांकि, उनके इस बयान के बाद से कांग्रेस की विचारधारा और उसकी तुष्टिकरण की राजनीति पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

न्यायिक प्रक्रिया और ठोस सबूतों की अनदेखी

बीके हरिप्रसाद को यह समझना होगा कि भारत की न्याय व्यवस्था भावनाओं या राजनीतिक भाषणों पर नहीं, बल्कि संविधान, कानूनी दस्तावेजों और पुख्ता सबूतों पर चलती है। उमर खालिद पिछले छह साल से किसी राजनीतिक बदले की भावना के तहत जेल में नहीं है, बल्कि उसके खिलाफ लगे आरोपों की गंभीरता को देश की शीर्ष अदालतों ने बार-बार स्वीकार किया है। दिल्ली की ट्रायल कोर्ट से लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय तक, हर स्तर पर खालिद की जमानत याचिकाओं को खारिज किया गया है। अदालतों ने स्पष्ट तौर पर माना है कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत यह संकेत देते हैं कि खालिद दिल्ली दंगों की एक बड़ी और पूर्व-नियोजित साजिश का हिस्सा था। इतना ही नहीं, सर्वोच्च न्यायालय में भी उसे कोई राहत नहीं मिल सकी और उसे अपनी याचिकाएं वापस लेने पर मजबूर होना पड़ा। जब अदालतें प्रथम दृष्टया आरोपों को सही मान रही हैं, तो किसी नेता का उसे राष्ट्रवादी घोषित करना कानून और न्यायिक गरिमा का अपमान है।

दिल्ली दंगों की साजिश और उमर खालिद का काला इतिहास

उमर खालिद का नाम देशविरोधी गतिविधियों के केंद्र में रहा है। जेएनयू से जुड़ी 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसी विवादास्पद नारेबाजी से लेकर सीएए और एनआरसी के दौरान दिल्ली में हुई हिंसा तक, खालिद की भूमिका जांच एजेंसियों की चार्जशीट में साफ तौर पर दर्ज है। फरवरी 2020 में जब दिल्ली में भीषण दंगे हुए थे, तब शहर को एक सुनियोजित साजिश के तहत जलाया गया था। जांच एजेंसियों के पास मौजूद कॉल रिकॉर्ड्स, खुफिया बैठकें और गवाहों के बयान बताते हैं कि ये दंगे अचानक नहीं हुए थे, बल्कि इनका ताना-बाना बहुत पहले से बुना जा रहा था। अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत दौरे के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि खराब करने की पूरी कोशिश की गई थी। इस हिंसा में 53 लोगों की जान गई और 700 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए। ऐसे में उस व्यक्ति को राष्ट्रवादी कहना, जिसने कथित तौर पर शहर को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया हो, देश की संप्रभुता के लिए खतरा है।

तुष्टिकरण की अंधी दौड़ और राष्ट्रीय सुरक्षा से खिलवाड़

कांग्रेस का यह रुख कोई नया नहीं है। बाटला हाउस एनकाउंटर के दौरान आंसू बहाने से लेकर जेएनयू के विवादास्पद तत्वों के बचाव में उतरने तक, पार्टी ने हमेशा से तुष्टिकरण की राजनीति को राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर रखा है। बीके हरिप्रसाद का ताजा बयान इसी घातक मानसिकता का एक और अध्याय है। जब कोई राष्ट्रीय पार्टी उस व्यक्ति का गुणगान करने लगे जिस पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) जैसी सख्त धाराओं के तहत मुकदमा चल रहा हो, तो वह उन पुलिसकर्मियों और मासूम नागरिकों के बलिदान का उपहास उड़ाती है, जो दंगों की भेंट चढ़ गए। हेड कांस्टेबल रतन लाल और आईबी अधिकारी अंकित शर्मा जैसे लोगों के परिजनों के लिए यह बयान जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। आखिर वोट बैंक की खातिर कांग्रेस किस हद तक गिर सकती है? यह सवाल अब हर जागरूक भारतीय के मन में है।

राष्ट्रवाद कोई राजनीतिक मुखौटा नहीं है

राष्ट्रवाद का अर्थ देश के प्रति समर्पण है, न कि राजनीतिक फायदे के लिए दंगाइयों को देशभक्त का तमगा देना। आज देश देख रहा है कि कौन संविधान की रक्षा में खड़ा है और कौन उन लोगों की ढाल बन रहा है जो देश की एकता को तोड़ने की साजिश रचते हैं। छह साल से जेल में बंद व्यक्ति को क्लीन चिट देने का प्रयास करके कांग्रेस ने फिर से साबित कर दिया है कि उसकी नजर में राष्ट्रहित से बड़ा राजनीतिक ध्रुवीकरण है। देश की जनता अब इन बहकावों में आने वाली नहीं है। जब साजिश के आरोपियों को राष्ट्रवाद के नाम पर महिमामंडित किया जाएगा, तो इसका जवाब चुनाव और देश की अदालतें ही देंगी। राष्ट्रवाद का पैमाना इतना सस्ता नहीं हो सकता कि उसे दंगों के साजिशकर्ताओं पर लागू कर दिया जाए।

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