खेती में रोगों का खतरा
फूलगोभी और पत्तागोभी की खेती को किसान भाई बहुत मेहनत और उम्मीदों के साथ करते हैं। हालांकि, उचित देखभाल के अभाव और पोषक तत्वों की कमी के कारण फसल में कई तरह के हानिकारक रोग लग सकते हैं, जो न केवल पैदावार को प्रभावित करते हैं, बल्कि किसानों को बड़ा आर्थिक नुकसान भी पहुँचाते हैं। बोकारो के कृषि एक्सपर्ट कुलदीप कुमार ने गोभीवर्गीय फसलों की सुरक्षा को लेकर विस्तृत जानकारी साझा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फूलगोभी कम समय में तैयार होकर अच्छी कमाई का साधन बनती है, लेकिन इसके लिए शुरुआत से ही पौधों का स्वस्थ होना जरूरी है। नर्सरी अवस्था से ही सावधानी न बरतने पर महंगे बीज और पौधे बर्बाद हो सकते हैं।
डंपिंग ऑफ: नर्सरी के लिए बड़ा संकट
फूलगोभी की नर्सरी में डंपिंग ऑफ या आद्र पतन सबसे आम और गंभीर समस्या के रूप में सामने आती है। इस रोग की पहचान यह है कि मिट्टी की सतह के बिल्कुल पास से पौधे का तना गलने लगता है। तना कमजोर होने के कारण पौधा मुरझाकर जमीन पर गिर जाता है। यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो पूरी की पूरी नर्सरी नष्ट हो सकती है।
- बचाव के लिए सबसे जरूरी है कि बुवाई से पूर्व बीजों का फफूंदनाशी से उपचार (सीड ट्रीटमेंट) किया जाए।
- नर्सरी की क्यारियों में पानी रुकने न दें और जल निकासी की उत्तम व्यवस्था सुनिश्चित करें।
- नमी और हवा का सही संतुलन बनाकर पौधों को इस बीमारी से बचाया जा सकता है।
ब्लैक रॉट: पत्तियों पर पीले धब्बों की पहचान
गोभीवर्गीय फसलों में ब्लैक रॉट एक बड़ी बीमारी मानी जाती है। इसकी शुरुआती पहचान पत्तियों के किनारों पर दिखने वाले V आकार के पीले धब्बों से की जा सकती है। जैसे-जैसे रोग बढ़ता है, ये धब्बे गहरे होने लगते हैं और पूरी पत्ती के साथ पौधे की वृद्धि भी रुक जाती है।
कृषि विशेषज्ञ कुलदीप कुमार के अनुसार, इस रोग के लक्षण दिखते ही नियंत्रण करना आवश्यक है। इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह पर कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की 2.5 से 3 ग्राम और स्ट्रेप्टोसाइक्लिन की 1 ग्राम मात्रा को प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर इस प्रक्रिया को 10 से 12 दिनों के अंतराल पर दोबारा दोहराया जा सकता है। याद रखें कि रसायनों का चयन हमेशा स्थानीय कृषि विभाग के निर्देशों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
क्लब रूट: जड़ों में गांठों का जाल
क्लब रूट एक मिट्टी जनित रोग है, जो प्लाज्मोडियोफोरा ब्रैसिकी नामक रोगजनक के कारण फैलता है। इस रोग की सबसे बड़ी पहचान पौधे की जड़ों में होने वाली असामान्य गांठें हैं। जब जड़े अपना सामान्य आकार खो देती हैं, तो पौधा पोषक तत्व नहीं सोख पाता, जिससे पत्तियों का रंग पीला पड़ने लगता है और विकास पूरी तरह रुक जाता है। यह बीमारी अम्लीय मिट्टी वाले खेतों में अधिक देखी जाती है।
इसके प्रबंधन के लिए खेत की मिट्टी की जांच कराना अनिवार्य है। मिट्टी का pH मान लगभग 7.2 या उससे अधिक बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए। इसके लिए विशेषज्ञों की सलाह पर चूने का उपयोग किया जा सकता है। साथ ही, किसान भाई एक ही खेत में लगातार गोभी की फसल न उगाएं और फसल चक्र का पालन करें।
बोरोन की कमी से फूलगोभी में ब्राउनिंग
फूलगोभी की गुणवत्ता सीधे तौर पर मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म पोषक तत्वों पर निर्भर करती है। बोरोन की कमी के कारण फसल में ब्राउनिंग की समस्या आम है। इसमें फूल का सही विकास नहीं हो पाता, फूल छोटा रह जाता है और उसका रंग भूरा दिखाई देने लगता है। कई मामलों में फूल अंदर से खोखले भी हो जाते हैं। ऐसी फसल बाजार में अपनी कीमत खो देती है और किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ता है।
इस समस्या को जड़ से मिटाने के लिए मिट्टी की जांच के बाद ही पोषक तत्व देने चाहिए। एक्सपर्ट का सुझाव है कि खेत की तैयारी के दौरान अंतिम जुताई के समय कृषि विशेषज्ञ की सलाह अनुसार बोरेक्स यानी सुहागा का प्रयोग मिट्टी में करें। इसकी मात्रा का निर्धारण हमेशा खेत की उर्वरता और फसल की विशिष्ट आवश्यकताओं के आधार पर ही करना चाहिए। सही समय पर पोषण प्रबंधन करके किसान अपनी पैदावार को सुरक्षित और गुणवत्तापूर्ण बना सकते हैं।
https://hindi.news18.com/news/agriculture/ways-to-protect-cauliflower-and-cabbage-from-diseases-local18-ws-l-10839503.html