क्या आप असली हैदराबादी हैं? चारमीनार के 100 चक्कर लगाने के बाद भी ऊपर क्यों नहीं चढ़ते स्थानीय लोग

हैदराबाद की पहचान चारमीनार के साथ स्थानीय लोगों का रिश्ता बेहद अनोखा है। वे इसके इर्द-गिर्द अपनी पूरी जिंदगी गुजार देते हैं, लेकिन ऊपर चढ़ने की जहमत कम ही उठाते हैं।

चारमीनार: पर्यटकों के लिए अजूबा, हैदराबादियों के लिए घर का हिस्सा

जब भी हैदराबाद शहर की बात आती है, तो जहन में सबसे पहले कुली कुतुब शाह द्वारा निर्मित 430 साल से भी पुरानी ऐतिहासिक इमारत चारमीनार और यहां की मशहूर बिरयानी का ख्याल आता है। यह शहर की पहचान है और दुनिया भर के पर्यटकों के लिए एक प्रमुख आकर्षण का केंद्र है। देश-विदेश से आने वाले लाखों लोग घंटों लंबी कतारों में खड़े रहकर टिकट का इंतजार करते हैं, ताकि वे चारमीनार की तंग और घुमावदार सीढ़ियों को चढ़कर ऊपर से पुराने शहर की खूबसूरती को निहार सकें।

हालांकि, यदि आप शहर के किसी स्थानीय निवासी से यह पूछें कि उन्होंने आखिरी बार चारमीनार की सीढ़ियाँ कब चढ़ी थीं, तो आपको अक्सर यही जवाब मिलेगा कि वे बचपन में किसी स्कूल ट्रिप पर गए थे या फिर तब, जब घर में शहर के बाहर से कोई मेहमान आया था। हैदराबाद के बाशिंदों के लिए चारमीनार कोई ऐसी जगह नहीं है जिसे देखने के लिए उन्हें अलग से योजना बनाने की जरूरत हो, बल्कि यह उनके दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग है।

रोजमर्रा की जिंदगी और चारमीनार का साया

पुराने शहर के लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए चारमीनार के साये में ही रहते हैं। लाड बाजार की मशहूर लाख की चूड़ियां और जड़ाऊ गहने खरीदने हों, मदीना चौक से इत्र और कपड़ों की खरीदारी करनी हो, या फिर रमजान की पवित्र रातों में हौज के आसपास की रौनक का आनंद लेना हो, स्थानीय लोग हर दिन चारमीनार के कई चक्कर लगाते हैं।

स्थानीय निवासी अक्सर चारमीनार के ठीक सामने स्थित ऐतिहासिक निमरा कैफे में बैठकर ईरानी चाय की चुस्कियां लेते हैं और उस्मानी बिस्किट का लुत्फ उठाते हैं। इस दौरान वे घंटों तक सामने खड़ी इस भव्य इमारत को देखते रहते हैं, लेकिन शायद ही कभी उनके मन में यह विचार आता है कि वे टिकट खरीदकर ऊपर जाएं। यह उदासीनता नहीं, बल्कि उस खास हैदराबादी तहजीब का हिस्सा है जो उन्हें अपनी संस्कृति से गहराई से जोड़कर रखती है।

क्यों नहीं चढ़ते ऊपर? यह है असली वजह

माजिद अन्ना जैसे स्थानीय लोग बताते हैं कि इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण हैदराबाद का वह खास सुकून और 'कल देख लेंगे' वाला नजरिया है। हैदराबादियों के मन में यह गहरी तसल्ली रहती है कि यह शानदार स्मारक तो अपने ही शहर में है और बिल्कुल घर के आंगन जैसा है, इसलिए इसे देखने के लिए किसी भी तरह की जल्दबाजी की जरूरत नहीं है।

इसी बेफिक्री और अपनापन भरे इत्मीनान में दिन, महीने और कभी-कभी पूरी पीढ़ियां गुजर जाती हैं। एक आम हैदराबादी के लिए चारमीनार की पहली मंजिल पर कदम रखने का मौका तभी आता है, जब उन्हें शहर के बाहर से आए किसी दोस्त या रिश्तेदार का टूरिस्ट गाइड बनकर साथ जाना पड़ता है।

हैदराबादी तहजीब का अनोखा अंदाज

दुनिया जिस इमारत को अपने कैमरे में कैद करने और उसकी मीनारों को छूने के लिए बेताब रहती है, वह हैदराबादी आवाम के लिए कोई अजूबा नहीं, बल्कि उनकी सांसों का हिस्सा है। शहर में एक आम धारणा प्रचलित है कि असली हैदराबादी वही है जो चारमीनार के सौ चक्कर तो काट ले, लेकिन उसके ऊपर चढ़ने की कभी कोई हड़बड़ी न दिखाए। यही इत्मीनान और सादगी इस शहर की संस्कृति को बाकी दुनिया से अलग बनाती है।

https://hindi.news18.com/news/nation/have-you-ever-climbed-to-the-top-of-charminar-in-hyderabad-local18-10835853.html