कवर्धा जिले में स्थित भंवरकोट गुफा इन दिनों अपनी अनोखी प्राकृतिक बनावट और रहस्यमयी संरचनाओं की वजह से चर्चा का विषय बनी हुई है। पड़रिया से करीब 8 किलोमीटर दूर बिछिपारा के घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच बसी यह गुफा प्रकृति की ऐसी कारीगरी को अपने भीतर समेटे हुए है, जिसे देखकर हर कोई पहली नजर में अचंभित रह जाता है। करीब 350 फीट की ऊंचाई पर मौजूद इस गुफा तक पहुंचने के लिए पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है।
भीतर पहुंचते ही बदल जाती है दुनिया
गुफा के अंदर कदम रखते ही पर्यटकों को एक बिल्कुल अलग अनुभव होता है। बाहर जहां गर्म हवाएं चलती रहती हैं, वहीं गुफा के भीतर पहुंचते ही तापमान में लगभग 5 से 10 डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट महसूस होती है। छत से लगातार टपकती बूंदें और पत्थरों पर उभरती प्राकृतिक आकृतियां इस स्थान को और भी आकर्षक बना देती हैं। यही कारण है कि यहां आने वाले लोग इसे प्रकृति की जीवंत कला दीर्घा कहते हैं।
पानी ने पत्थरों पर रची अद्भुत कलाकारी
विशेषज्ञों के मुताबिक भंवरकोट गुफा चूना पत्थर से बनी है। वर्षों पहले इसके भीतर से पानी का बहाव होता था और धीरे-धीरे उसी पानी ने चट्टानों को काटकर गुफा का यह स्वरूप तैयार किया। आज भी छत से गिरती बूंदें पत्थरों पर नई संरचनाएं गढ़ रही हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि इनमें से कुछ आकृतियां शिवलिंग जैसी दिखती हैं, तो कई संरचनाएं साधु की जटाओं की तरह नजर आती हैं।
भूगर्भीय दृष्टि से यह प्रक्रिया बेहद धीमी मानी जाती है। माना जाता है कि ऐसी एक छोटी आकृति के बनने में कई दशकों से लेकर एक सदी तक का समय लग सकता है। यही वजह है कि गुफा के भीतर मौजूद हर संरचना प्रकृति के लंबे विकासक्रम की कहानी कहती है।
200 फीट लंबी गुफा और कई रहस्य
भंवरकोट क्षेत्र की मुख्य गुफा करीब 200 फीट लंबी बताई जाती है, जबकि एक अन्य गुफा लगभग 150 फीट तक फैली हुई है। इसके अलावा क्षेत्र में दो और छोटी गुफाएं भी मौजूद हैं। ये चारों गुफाएं मिलकर करीब 200 मीटर के दायरे में फैली हुई हैं। इन गुफाओं की प्राकृतिक संरचनाएं पर्यटकों के साथ-साथ शोधकर्ताओं को भी अपनी ओर खींचती हैं। कई लोग यहां भूगर्भीय अध्ययन के लिए आते हैं, तो बड़ी संख्या में पर्यटक प्राकृतिक सौंदर्य निहारने पहुंचते हैं।
आस्था से भी जुड़ा है भंवरकोट
भंवरकोट सिर्फ प्राकृतिक धरोहर ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की आस्था का केंद्र भी है। पहाड़ी के ऊपरी हिस्से में एक ऐसा स्थान है, जहां लक्ष्मण जी के पदचिह्न होने की मान्यता है। ग्रामीणों का विश्वास है कि वनवास के दौरान भगवान श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण यहां आए थे। इसी आस्था के चलते आसपास के गांवों के लोग यहां श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करने पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का यह मेल भंवरकोट को विशेष पहचान देता है।
पर्यटन की असीम संभावनाएं
करीब 600 की आबादी वाले बिछिपारा गांव के आसपास फैला यह क्षेत्र पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। जिला मुख्यालय से दूरी अपेक्षाकृत कम होने के कारण यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। अगर बुनियादी सुविधाओं और प्रचार-प्रसार पर ध्यान दिया जाए तो यह स्थान छत्तीसगढ़ के प्रमुख इको-टूरिज्म और जियो-टूरिज्म केंद्रों में शामिल हो सकता है।
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