मुहर्रम में मातम क्यों मनाया जाता है? जानिए कर्बला के उस बलिदान की कहानी जिसने दुनिया बदल दी

इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने मुहर्रम की पहचान इमाम हुसैन की शहादत से जुड़ी है। जानिए क्यों दुनिया भर के मुसलमान इस महीने में गम और मातम मनाते हैं।

मुहर्रम और मातम का संबंध

मुहर्रम का महीना इस्लामी हिजरी कैलेंडर की शुरुआत का प्रतीक है, लेकिन दुनिया भर में इसे किसी उत्सव की तरह नहीं बल्कि गम और यादों के महीने के रूप में देखा जाता है। इस महीने की 10वीं तारीख, जिसे अशूरा कहा जाता है, बहुत महत्वपूर्ण है। यह दिन इतिहास की एक ऐसी घटना से जुड़ा है जिसने मानवता को सत्य और न्याय के लिए अडिग रहने का संदेश दिया।

कर्बला की वह दर्दनाक घटना

इतिहास के पन्नों में दर्ज कर्बला की जंग अन्याय के खिलाफ संघर्ष की कहानी है। इसी दिन पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अपने सिद्धांतों और सत्य के मार्ग पर चलते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया था। कर्बला की तपती रेत पर हुई इस शहादत को याद करते हुए हर साल मुसलमान शोक मनाते हैं। यह मातम न केवल एक समुदाय की आस्था है, बल्कि यह अन्याय के विरोध का प्रतीक भी बन गया है।

क्या है मुहर्रम का महत्व

इस्लाम में मुहर्रम को चार सबसे पवित्र महीनों में गिना जाता है। इसका महत्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों और आत्मचिंतन से जुड़ा हुआ है। मुहर्रम का संदेश हमें सिखाता है कि सत्य और न्याय की राह पर चलना कितना कठिन हो सकता है, लेकिन उसके लिए बलिदान देना इतिहास को नई दिशा देता है। दुनिया भर के मुसलमान इस दिन को पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं ताकि इमाम हुसैन की सीख आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके।

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