दाग-धब्बों से मुक्ति की कवायद
रेलवे स्टेशनों पर पान और गुटखा खाने वालों द्वारा फैलाई गई गंदगी हमेशा से प्रशासन के लिए सिरदर्द रही है। इसी समस्या का हल निकालने के लिए पश्चिम रेलवे ने एक नई पहल की है। माटुंगा रोड स्टेशन पर एक जर्मन नैनो-कोटिंग तकनीक आधारित पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत की गई है। इस प्रोजेक्ट के माध्यम से अधिकारियों का दावा है कि दीवारों और खंभों पर लगे जिद्दी दागों को साफ करने में जो समय पहले 30 मिनट लगता था, वह अब घटकर मात्र 5 मिनट रह जाएगा। इस पूरी परियोजना पर 5 लाख रुपये की लागत आई है।
कैसे काम करेगी यह आधुनिक तकनीक?
स्टेशन के कुल 3,700 वर्ग फुट के दायरे में आठ अलग-अलग स्थानों पर यह विशेष नैनो-कोटिंग की गई है। इसमें दीवारें, लिफ्ट, खंभे और छत के निचले हिस्से शामिल हैं। यह कोटिंग सतह पर एक ऐसी सुरक्षा परत बना देती है, जिससे पान की पीक या गंदगी सतह के भीतर नहीं समा पाती है। इसके चलते सफाई कर्मचारियों को बार-बार मशक्कत नहीं करनी पड़ती और वे सामान्य पानी के उपयोग से ही सतह को आसानी से साफ कर सकते हैं।
अधिकारियों का रुख
पश्चिम रेलवे के CPRO विनीत अभिषेक ने इस पहल पर कहा कि यह अभी एक पायलट प्रोजेक्ट है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कोटिंग की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इस पर गंदगी टिकती नहीं है, जिससे समय की भारी बचत होती है और स्वच्छता बनी रहती है। फिलहाल रेलवे इसके परिणामों का बारीकी से अध्ययन कर रहा है, जिसके बाद इसे अन्य स्टेशनों पर भी लागू करने पर विचार किया जाएगा।
क्या वास्तव में सुधरेंगे हालात?
हालांकि इस नई तकनीक ने उम्मीदें जगाई हैं, लेकिन आम जनता और विशेषज्ञों के बीच कई सवाल भी उठ रहे हैं:
- सवाल यह है कि क्या कोटिंग होने के बाद लोग थूकना बंद कर देंगे या दीवारों को निशाना बनाना जारी रखेंगे?
- क्या केवल दीवारें चमकाने से स्टेशन की समग्र स्वच्छता में स्थायी बदलाव आएगा?
- रेलवे प्रशासन गंदगी फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई करने में अब तक क्यों नाकाम रहा है?
- स्टेशन का एक छोटा हिस्सा साफ दिखने से क्या यात्रियों की गंदी आदतें बदल पाएंगी?
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