नर्सरी विधि से अरहर की खेती के फायदे
सागर और पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में अरहर की खेती करने वाले किसान अब पारंपरिक तरीकों को छोड़कर नर्सरी विधि को अपना रहे हैं। यह तकनीक किसानों के लिए समय की बचत और अधिक उत्पादन का जरिया बन गई है। विशेषज्ञों और सफल किसानों का मानना है कि इस विधि को अपनाने में अधिकतम 5 हजार रुपये का खर्च आता है, जबकि इसके बदले में किसान अपनी लागत से लगभग 10 गुना तक मुनाफा कमा सकते हैं।
कैसे काम करती है यह तकनीक
युवा किसान आकाश चौरसिया, जो पिछले 8 साल से जंगली अरहर की खेती कर रहे हैं, बताते हैं कि नर्सरी विधि प्रतिकूल मौसम में भी फसल को सुरक्षित रखती है। इस प्रक्रिया में ढाई गुणा 6 इंच की पॉलिथीन में 2 से 3 बीज एक साथ डाले जाते हैं। जब ये पौधे 15 से 20 दिन के हो जाते हैं, तब इन्हें सीधे खेत में ट्रांसप्लांट कर दिया जाता है। इस विधि के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
- बीजों का जर्मिनेशन फेल होने का खतरा नहीं रहता, क्योंकि जो भी खराब होना होता है वह पॉलिथीन में ही पता चल जाता है।
- सीधे खेत में बीज बोने पर कम या ज्यादा बारिश से फसल खराब होने का डर रहता है, जिससे बचाव होता है।
- पौधे को खेत में लगाने के बाद वह कम पानी और अधिक पानी दोनों स्थितियों में जीवित रहने में सक्षम होता है।
कम लागत में बंपर उत्पादन
इस जंगली अरहर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक बार लगाने के बाद यह फसल 5 साल तक उत्पादन देती है। किसान एक एकड़ में केवल 1 किलो बीज का उपयोग करके 8 से 10 क्विंटल तक की उपज प्राप्त कर सकते हैं। यह फसल साल में दो बार कटिंग देती है और बाजार में इसकी भारी डिमांड है। चौरसिया के अनुसार, यदि किसान सितंबर-अक्टूबर के बाद एक सिंचाई और कर देते हैं, तो उत्पादन और भी बेहतर हो सकता है। यह दाल स्वाद में बेहतर होने के साथ-साथ फाइबर से भरपूर है, जिसके कारण बाजार में इसके अच्छे दाम मिलते हैं।
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