ईरान युद्ध अपने चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है और अमेरिका के भीतर यह सवाल लगातार गहराता जा रहा है कि आखिर यह टकराव कब तक खिंचेगा। अमेरिकी संविधान और वॉर पावर एक्ट के प्रावधानों के मुताबिक राष्ट्रपति कांग्रेस की अनुमति के बिना अमेरिकी सेना को 60 दिनों से अधिक समय तक किसी सक्रिय युद्ध में नहीं रख सकते। इसी पृष्ठभूमि में अब निचले सदन ने एक अहम कदम उठाया है।
हाउस में पास हुआ वॉर पावर्स रेजोल्यूशन
अमेरिका की हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स ने 3 जून, 2026 को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को राजनीतिक रूप से बड़ा झटका दिया। सांसदों ने 215-208 के मत विभाजन से एक वॉर पावर्स रेजोल्यूशन को मंजूरी दी, जिसमें ईरान के विरुद्ध जारी अमेरिकी सैन्य अभियान पर रोक लगाने और युद्ध से जुड़े फैसलों में कांग्रेस की पकड़ मजबूत करने की मांग रखी गई है।
खास बात यह रही कि चार रिपब्लिकन सांसदों—थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन—ने डेमोक्रेट्स के पक्ष में मतदान कर अपनी ही पार्टी की लाइन तोड़ दी। तीस महीने लंबे इस ईरान संघर्ष के दौरान निचले सदन का यह पहला कामयाब कदम माना जा रहा है।
प्रस्ताव में क्या कहा गया है
इस प्रस्ताव में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है कि यदि अमेरिका को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान आगे भी चलाना है, तो उसके लिए कांग्रेस की मंजूरी अनिवार्य रहेगी। 1973 के वॉर पावर्स रेजोल्यूशन का हवाला देते हुए यह ट्रंप प्रशासन को निर्देश देता है कि 60 दिनों की समयसीमा बीतने के बाद कार्रवाई रोक दी जाए।
हालांकि यह एक कॉन्करेंट रेजोल्यूशन है, जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसे सीनेट से भी पारित होना जरूरी है और इस पर राष्ट्रपति को वीटो का अधिकार नहीं मिलता। ट्रंप और उनके सहयोगी इसे असंवैधानिक करार दे रहे हैं और इसे राष्ट्रपति की कमांडर-इन-चीफ की भूमिका पर सीधा हमला बता रहे हैं।
ट्रंप के लिए कानूनी नहीं, राजनीतिक चुनौती
इस प्रस्ताव की ताकत कानूनी बाध्यता में नहीं, बल्कि उसके सख्त राजनीतिक संदेश में है। ट्रंप पर इससे कोई तत्काल कानूनी रोक नहीं लगेगी, लेकिन यह साफ संकेत देता है कि कांग्रेस में उनकी ईरान नीति को लेकर नाराजगी लगातार बढ़ रही है। युद्ध के चलते तेल की कीमतें चढ़ी हैं, गैस की कीमतें प्रभावित हुई हैं और मध्य पूर्व में अस्थिरता फैली है। सर्वेक्षणों में युद्ध की लोकप्रियता घट रही है, खासकर मिडटर्म चुनावों के नजरिए से।
कुछ दिन पहले भी ऐसे ही प्रस्तावों पर क्रॉस-वोटिंग देखने को मिली थी। इससे पहले की कोशिशें नाकाम रही थीं, लेकिन चौथे प्रयास में कामयाबी हाथ लगी। यह घटनाक्रम रिपब्लिकन पार्टी के भीतर के मतभेदों को भी उजागर करता है।
रिपब्लिकन पार्टी में बंटवारा
लिबर्टेरियन झुकाव वाले मैसी जैसे कुछ रिपब्लिकन कांग्रेस की मंजूरी को संवैधानिक सिद्धांत मानते हैं। दूसरी ओर पार्टी का नेतृत्व ट्रंप के साथ खड़ा है और तर्क दे रहा है कि यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के हाथ बांध देगा।
क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा?
ईरान युद्ध ने अमेरिकी राजनीति की दिशा को गहराई तक प्रभावित किया है। ट्रंप के पहले कार्यकाल की ‘मैक्सिमम प्रेशर’ नीति के बाद यह दूसरी बार है जब ईरान का मुद्दा केंद्र में आ गया है। शुरुआत में डेमोक्रेट्स और कुछ रिपब्लिकन ने हमलों का समर्थन किया था, मगर जैसे-जैसे टकराव लंबा खिंचा, इसकी सैन्य, आर्थिक और मानवीय कीमत सामने आने लगी। अब डेमोक्रेट्स इसे ट्रंप की अनावश्यक युद्ध नीति बता रहे हैं, जबकि रिपब्लिकन खेमे में भी युद्ध-थकान साफ झलक रही है।
2026 मिडटर्म्स पर असर
यह पूरा घटनाक्रम 2026 के मिडटर्म चुनावों के लिहाज से बेहद अहम है। अगर युद्ध जारी रहा और अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़ा, तो कांग्रेस की सीटों पर इसका प्रभाव दिख सकता है। सीनेट में रिपब्लिकन बहुमत के बावजूद कुछ मॉडरेट सीनेटर्स भी दबाव महसूस कर रहे हैं। अगर सीनेट भी इस प्रस्ताव को पारित कर देती है, तो ट्रंप पर और दबाव बनेगा, हालांकि वे इसे अनदेखा भी कर सकते हैं।
शक्ति संतुलन की बहस फिर तेज
कुल मिलाकर ईरान युद्ध ने अमेरिकी राजनीति में शक्ति संतुलन की बहस को दोबारा जिंदा कर दिया है। कांग्रेस अपनी खोई भूमिका वापस पाने की कोशिश में है, जबकि कार्यपालिका मजबूत राष्ट्रपति शक्ति की पक्षधर है। यह सिर्फ ट्रंप बनाम कांग्रेस का मामला नहीं, बल्कि संवैधानिक सिद्धांतों और व्यावहारिक राजनीति के बीच का टकराव है। आने वाले दिनों में सीनेट की कार्रवाई और ट्रंप की प्रतिक्रिया ही तय करेगी कि यह झटका महज एक संकेत है या किसी बड़े बदलाव की शुरुआत।
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