भारत में गर्मी का बढ़ता प्रकोप
भारत में गर्मी का मौसम अब पहले की तुलना में कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण और जानलेवा होता जा रहा है। क्लाइमेट सेंट्रल के नवीनतम विश्लेषण से पता चलता है कि देश में न केवल धूप की तपिश बढ़ रही है, बल्कि उमस ने भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। शोध के आंकड़ों के मुताबिक, 1970 के दशक में भारत में औसतन 101 दिन ऐसे होते थे जिन्हें खतरनाक गर्मी की श्रेणी में रखा जाता था। हालांकि, वर्ष 2016 से 2025 के बीच यह संख्या बढ़कर 141 दिन प्रति वर्ष हो गई है। यह वृद्धि सीधे तौर पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को दर्शाती है और इंसानी स्वास्थ्य के लिए एक चेतावनी की तरह है।
वेट-बल्ब तापमान और इसका खतरा
इस रिपोर्ट में वेट-बल्ब तापमान के महत्व पर जोर दिया गया है। जब यह तापमान 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है, तो स्थिति इंसानों के लिए घातक होने लगती है। यह माप केवल हवा की गर्मी को नहीं, बल्कि नमी और गर्मी के मिले-जुले प्रभाव को दर्शाता है, जिसे मानव शरीर महसूस करता है। सामान्यतः पसीना आने से शरीर खुद को ठंडा रखता है, लेकिन अत्यधिक उमस के कारण पसीना सूख नहीं पाता है। पसीना न सूखने की वजह से शरीर का आंतरिक तापमान बढ़ने लगता है, जो हीट स्ट्रोक और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनता है।
वैश्विक स्तर पर स्थिति
यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया इस बदलाव की चपेट में है। वैश्विक स्तर पर ऐसे खतरनाक दिनों की संख्या दोगुनी से अधिक हो गई है। 1970 के दशक में पूरी दुनिया में साल में औसतन 10 दिन खतरनाक गर्मी वाले होते थे, जो 2016 से 2025 के दौरान बढ़कर 23 दिन हो गए हैं। उष्णकटिबंधीय आर्द्र क्षेत्रों में इसका असर सबसे अधिक महसूस किया जा रहा है।
जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार कौन
विश्लेषण के अनुसार, इस खतरनाक बदलाव के पीछे मुख्य कारक मानवीय गतिविधियां और उनसे होने वाला जलवायु परिवर्तन है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि 1970 के बाद से दुनिया भर में दर्ज किए गए खतरनाक गर्मी के 64 प्रतिशत दिनों के लिए इंसान सीधे तौर पर जिम्मेदार हैं। प्रदूषण के कारण ग्लोबल वार्मिंग खतरनाक स्तर पर पहुंच गई है, जिसके चलते जो स्थितियां पहले कभी-कभार देखने को मिलती थीं, वे अब जीवन का एक सामान्य और डरावना हिस्सा बन गई हैं।
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