करोड़ों खर्च कर खरीदी गईं सिटी बसें बनीं कबाड़, सड़क पर बची सिर्फ 4, ऑटो वाले वसूल रहे मनमाना किराया

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में करोड़ों रुपये की लागत से शुरू हुई सिटी बस सेवा अब दम तोड़ती नजर आ रही है। कुल 20 में से केवल 4 बसें चल रही हैं, जिससे यात्रियों को ऑटो चालकों की मनमानी झेलनी पड़ रही है।

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ शहर में आम लोगों और मध्यमवर्गीय परिवारों को सस्ता और आसान सफर मुहैया कराने के मकसद से करोड़ों रुपये खर्च कर सिटी बस सेवा शुरू की गई थी। मगर आज यही योजना प्रशासनिक उदासीनता और देखरेख के अभाव में अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। एक समय शहर की प्रमुख सड़कों पर फर्राटा भरने वाली कुल 20 बसों में से इस वक्त महज 4 बसें ही किसी तरह संचालित हो पा रही हैं, जबकि शेष 16 बसें वर्षों से डिपो में एक ही जगह खड़ी-खड़ी कबाड़ में तब्दील हो चुकी हैं। करोड़ों रुपये का यह सरकारी निवेश अब लोहे के ढेर में बदलता दिख रहा है।

पेट्रोल-डीजल की महंगाई के बीच बढ़ी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की मांग

पेट्रोल और डीजल की लगातार चढ़ती कीमतों के बीच शहरवासियों में सार्वजनिक परिवहन की मांग एक बार फिर जोर पकड़ने लगी है। जब हमारी टीम ने रायगढ़ के चक्रधर नगर स्थित बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन का हाल जाना, तो वहां यात्रियों की परेशानी साफ झलक रही थी।

दूसरे शहरों से आने वाले यात्री सबसे ज्यादा परेशान

बलौदाबाजार और सतना जैसे दूसरे शहरों से आने वाले यात्रियों ने बताया कि सिटी बसें न चलने की वजह से उन्हें स्थानीय सफर के लिए मजबूरन ऑटो का सहारा लेना पड़ रहा है। जहां सिटी बस का किराया सिर्फ 10 से 15 रुपये हुआ करता था, वहीं ऑटो वाले उतनी ही दूरी के लिए 50 से 100 रुपये तक मनमानी रकम वसूल रहे हैं।

90 लाख खर्च के बाद भी नहीं बदले हालात

नगर निगम ने हाल ही में बंद पड़ी बसों में से सिर्फ 4 बसों को दोबारा सड़क पर उतारने के लिए करीब 90 लाख रुपये का भारी-भरकम बजट खर्च किया है। इन 4 बसों के अलावा कबाड़ बन चुकी बाकी 16 बसों का भविष्य क्या होगा, इसे लेकर नगर निगम के अधिकारी अब भी असमंजस में हैं और उन्होंने आगे की कार्रवाई के लिए शासन से मार्गदर्शन मांगा है। अधिकारियों का दावा है कि शेष बसों के संचालन को लेकर जल्द ही कोई ठोस फैसला लिया जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि यात्रियों को अभी लंबा इंतजार करना पड़ सकता है।

निजी ऑपरेटरों और ऑटो चालकों की 'मोनोपोली'

सरकारी बसों के इस तरह ठप पड़ने का सीधा लाभ शहर के निजी बस संचालकों और ऑटो चालकों को मिल रहा है। बाजार में कोई दूसरा सस्ता सरकारी विकल्प न होने के कारण ऑटो चालकों का एकछत्र राज (मोनोपोली) कायम है। बाहर से आने वाले भोले-भाले यात्रियों से मनमाना किराया वसूला जा रहा है, जिससे आम जनता की जेब पर भारी बोझ पड़ रहा है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकार को इस योजना को दोबारा पूरी क्षमता के साथ शुरू करना चाहिए, ताकि बढ़ती महंगाई के इस दौर में लोगों को कुछ राहत मिल सके।

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