देहरादून का लक्खीबाग: कभी एशिया की सबसे बड़ी लकड़ी मंडी का दिलचस्प इतिहास

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का लक्खीबाग क्षेत्र ब्रिटिश शासनकाल में एशिया की सबसे बड़ी लकड़ी मंडी के रूप में विख्यात था, जहां से देश भर में कीमती लकड़ियां पहुंचाई जाती थीं।

इतिहास के पन्नों में लक्खीबाग

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का लक्खीबाग और भंडारीबाग इलाका आज भले ही एक रिहायशी क्षेत्र हो, लेकिन इतिहास में यह स्थान व्यापारिक रूप से काफी समृद्ध था। ब्रिटिश काल के दौरान देहरादून को टिंबर कैपिटल के रूप में जाना जाता था। यहां की लकड़ी मंडी न केवल भारत बल्कि पूरे एशिया में सबसे बड़े केंद्रों में से एक मानी जाती थी।

क्यों पड़ा लक्खीबाग नाम

इस ऐतिहासिक क्षेत्र के नामकरण के पीछे एक रोचक तथ्य छिपा है। जानकारों के अनुसार, पुराने समय में देहरादून के एक महंत ने इस पूरे इलाके में एक लाख पेड़ लगवाए थे। पेड़ों की इतनी विशाल संख्या के कारण ही इस इलाके का नाम लक्खीबाग पड़ गया। उस दौर में यह पूरा इलाका घने और हरे-भरे पेड़ों से ढका रहता था, जो इसे अत्यंत सुंदर बनाता था।

रेलवे और ब्रिटिश जहाजों का आधार

अंग्रेजों ने भारत में अपने रेलवे नेटवर्क के विस्तार और शाही नौसेना के जहाजों के निर्माण के लिए देहरादून के जंगलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। लक्खीबाग टिंबर मार्केट को रणनीतिक रूप से देहरादून रेलवे स्टेशन के पास बसाया गया था, ताकि लकड़ियों की ढुलाई आसान हो सके। 1897 में हरिद्वार और देहरादून के बीच शुरू हुआ रेलवे ट्रैक का काम 1899 में पूरा हुआ और 1900 से यहां ट्रेनों का संचालन शुरू हो गया। इसके बाद साल, शीशम, सागौन और देवदार जैसी बेशकीमती लकड़ियों को ट्रेन के जरिए पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक भेजा जाने लगा।

आज भी मौजूद है पुरानी कलाकारी

भले ही मंडी का स्वरूप आज बदल गया है, लेकिन देहरादून की वास्तुकला में उस दौर की झलक आज भी दिखाई देती है। राजपुर रोड के पुराने बंगले, मुख्यमंत्री आवास और जौनसार बावर के महासू देवता मंदिर की बारीक नक्काशी इस बात का प्रमाण है। शहर के कई पुराने घरों में आज भी 100 साल पुराने फर्नीचर और दरवाजे अपनी मजबूती के साथ मौजूद हैं।

बदलते दौर में व्यापार का स्वरूप

स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि अब लकड़ी का कारोबार पहले जैसा नहीं रहा है। वन निगम के गठन के बाद अब वैज्ञानिक तरीके से पेड़ों की कटाई और बिक्री की प्रक्रिया अपनाई जाती है। समय के साथ पेड़ों की संख्या भी कम हुई है और अब यह व्यापार मुख्य रूप से उत्तराखंड और इसके पड़ोसी राज्यों तक ही सीमित रह गया है।

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