उर्दू साहित्य में परवीन शाकिर का नाम बेहद संवेदनशील, खूबसूरत और लोकप्रिय शायरा के रूप में लिया जाता है। उन्होंने अपनी रचनाओं के जरिए उर्दू अदब में औरत के नजरिए और उसके मन की भावनाओं को एक नया और मजबूत मुकाम दिया। यही वजह है कि उन्हें "खुशबू की शायरा" के नाम से जाना गया।
एक लड़की और एक औरत के सच्चे जज्बातों, उसके प्यार, भीतरी कशमकश, मान-सम्मान और समाज के दोहरे रवैये को उन्होंने बहुत सादगी और गहराई के साथ शब्दों में ढाला। उनकी शायरी आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। इसी कड़ी में यहां हम परवीन शाकिर की कुछ मशहूर पंक्तियां लेकर आए हैं।
परवीन शाकिर की मशहूर शायरी
बारहा तेरा इंतिज़ार कियाअपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह
राय पहले से बना ली तू नेदिल में अब हम तिरे घर क्या करते
अब्र बरसे तो इनायत उस कीशाख़ तो सिर्फ़ दुआ करती है
शब वही लेकिन सितारा और हैअब सफ़र का इस्तिआरा और है
क्या करे मेरी मसीहाई भी करने वालाज़ख़्म ही ये मुझे लगता नहीं भरने वाला
घर आप ही जगमगा उठेगादहलीज़ पे इक क़दम बहुत है
ज़िंदगी मेरी थी लेकिन अब तोतेरे कहने में रहा करती है
जंग का हथियार तय कुछ और थातीर सीने में उतारा और है
रात के शायद एक बजे हैंसोता होगा मेरा चांद
बहुत से लोग थे मेहमान मेरे घर लेकिनवो जानता था कि है एहतिमाम किस के लिए
दिल को छू लेने वाली पंक्तियां
इसी तरह से अगर चाहता रहा पैहमसुख़न-वरी में मुझे इंतिख़ाब कर देगा
पास जब तक वो रहे दर्द थमा रहता हैफैलता जाता है फिर आँख के काजल की तरह
मसअला जब भी चराग़ों का उठाफ़ैसला सिर्फ़ हवा करती है
गवाही कैसे टूटती मुआमला ख़ुदा का थामिरा और उस का राब्ता तो हाथ और दुआ का था
रफ़ाक़तों का मिरी उस को ध्यान कितना थाज़मीन ले ली मगर आसमान छोड़ गया
क़दमों में भी तकान थी घर भी क़रीब थापर क्या करें कि अब के सफ़र ही अजीब था
हारने में इक अना की बात थीजीत जाने में ख़सारा और है
मैं उस की दस्तरस में हूं मगर वोमुझे मेरी रज़ा से मांगता है
हुस्न के समझने को उम्र चाहिए जानांदो घड़ी की चाहत में लड़कियाँ नहीं खुलतीं
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