पश्चिम बंगाल की सियासत में तृणमूल कांग्रेस के अंदर मचा घमासान अब अपने चरम पर पहुंच गया है। साल 2026 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की भारी पराजय और उसके बाद उपजे बिखराव के बीच, नेता प्रतिपक्ष की कमान संभालते ही बागी खेमे के अग्रणी नेता ऋतब्रत बनर्जी ने एक तीखी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर पूरे राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी है।
कोलकाता में मीडिया से मुखातिब होते हुए ऋतब्रत बनर्जी ने बेहद नपे-तुले और हमलावर अंदाज में यह स्पष्ट किया कि पार्टी के भीतर उठी यह बगावत पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है, बल्कि उनके भतीजे और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के 'कॉर्पोरेट और तानाशाही' रवैये के विरोध में है।
ममता के प्रति निष्ठा, अभिषेक पर सीधा निशाना
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ऋतब्रत बनर्जी ने उन कयासों को पूरी तरह नकार दिया, जिनमें कहा जा रहा था कि बागी गुट ममता बनर्जी का राजनीतिक वजूद ही खत्म करना चाहता है। उन्होंने ममता के प्रति अपनी पक्की वफादारी जताते हुए पार्टी और संगठन की मौजूदा बदहाली के लिए सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया।
इस बयान से यह साफ हो गया है कि बागी धड़ा अब कानूनी और राजनीतिक रूप से खुद को 'असली तृणमूल' के तौर पर खड़ा करने के बेहद करीब पहुंच चुका है, लेकिन वह ममता बनर्जी के बंगाली अस्मिता वाले चेहरे को खोना नहीं चाहता।
'ममता हमारी मार्गदर्शक, अभिषेक से कोई वास्ता नहीं'
पत्रकारों के तीखे सवालों के जवाब में ऋतब्रत बनर्जी ने अपनी आगामी रणनीति और नेतृत्व को लेकर एक दिलचस्प और दूरगामी बात रखी। ममता और अभिषेक को लेकर बागी गुट के रुख को उन्होंने बिल्कुल शीशे की तरह साफ कर दिया।
मैं पूरी तरह स्पष्ट और दो टूक कहना चाहता हूं कि हमारी नेता आज भी सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी हैं। हम दिल से चाहते हैं कि वे हमारी मार्गदर्शक, अभिभावक और सलाहकार बनी रहें और हमारी संसदीय पार्टी को राह दिखाएं, क्योंकि उन्हीं के संघर्ष से यह दल खड़ा हुआ है। लेकिन जहां तक अभिषेक बनर्जी का सवाल है, तो इस 18वीं विधानसभा से अब उनका कोई लेना-देना नहीं है।
ऋतब्रत का यह बयान साफ करता है कि बागी गुट ने अभिषेक बनर्जी को पूरी तरह अलग-थलग करने की ठान ली है। ममता बनर्जी को सम्मान देकर वे वफादार कार्यकर्ताओं और वोट बैंक को यह संदेश देना चाहते हैं कि असली चूक 'भतीजे' से हुई है, 'दीदी' से नहीं।
58 विधायकों का दावा, जल्द 60 के पार पहुंचने का भरोसा
अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बनर्जी ने सदन के भीतर अपने खेमे के आंकड़े भी सामने रखे। उन्होंने दावा किया कि ममता बनर्जी की बुलाई बैठकों से दूरी बनाने वाले विधायकों की तादाद लगातार बढ़ रही है और दलबदल विरोधी कानून से बचने के लिए उनके पास पर्याप्त संख्या बल मौजूद है।
- मौजूदा ताकत: ऋतब्रत के अनुसार, इस समय आधिकारिक रूप से 58 निर्वाचित विधायक मजबूती से उनके साथ खड़े हैं, जिन्होंने उन्हें नेता प्रतिपक्ष के रूप में अपना समर्थन दिया है।
- आगे की रणनीति: उनका दावा है कि अगले 24 से 48 घंटों के भीतर दो और टीएमसी विधायक ममता खेमे को छोड़कर उनके साथ आ जाएंगे, जिससे यह आंकड़ा बढ़कर 60 हो जाएगा।
सदन में अपनी भूमिका को लेकर ऋतब्रत ने कहा कि वे भाजपा की सुवेंदु अधिकारी सरकार के सामने किसी कमजोर या बिकाऊ विपक्ष की तरह काम नहीं करेंगे। उन्होंने कहा, “हम सदन के भीतर बेहद रचनात्मक और आक्रामक ढंग से सरकार की गलत नीतियों का विरोध करेंगे। तृणमूल कांग्रेस बंगाल की जनता के हक के लिए एक जिम्मेदार और मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएगी।”
आखिर इस दांव के पीछे की असली क्रोनोलॉजी क्या है?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऋतब्रत बनर्जी का यह बयान एक सुनियोजित कानूनी और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। खुद को 'ममता समर्थक' और 'अभिषेक विरोधी' बताकर वे टीएमसी के उन बाकी विधायकों को भी अपने पाले में खींचना चाहते हैं, जो अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली से नाराज तो हैं, लेकिन ममता के डर या सम्मान के चलते अब तक खुलकर सामने नहीं आ पाए थे।
अब गेंद पूरी तरह ममता बनर्जी के पाले में है। उनके लिए यह स्थिति बेहद पीड़ादायक है, जहां उनके अपने विधायक उनके भतीजे को 'खलनायक' ठहराकर खुद उन्हीं को सलाहकार बनने का प्रस्ताव दे रहे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक का सियासी भविष्य बचाने के लिए इन 60 विधायकों को पूरी तरह छोड़ देंगी, या फिर पार्टी को बचाने के लिए कोई बीच का रास्ता तलाशेंगी? तय है कि बंगाल विधानसभा का यह सत्र बेहद हंगामेदार रहने वाला है।
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