राजस्थान के कोटपूतली स्थित अजीतपुरा गांव के लोगों के सामने इस समय एक कठिन सवाल खड़ा है—अपना गांव बचाएं या घर छोड़कर चले जाएं। जयपुर से करीब 100 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में पिछले करीब 300 दिनों से चल रहा आंदोलन अब महज खदान के विरोध तक सीमित नहीं रहा। यह ग्रामीणों के लिए अपने घर, जमीन और भविष्य को बचाने की लड़ाई बन चुका है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि गांव वाले कह रहे हैं कि अगर खदान बंद नहीं की जा सकती तो पूरे गांव का पुनर्वास कर दिया जाए, क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में वे लगातार भय के साये में जी रहे हैं।
एक साल पहले हुआ था खदान आवंटन
ग्रामीणों के अनुसार करीब एक साल पहले अजीतपुरा गांव में नेशनल लाइम स्टोन को खदान आवंटित की गई थी। उनका कहना है कि यह खदान गांव की सीमा के बहुत नजदीक है। एक ओर गांव का श्मशान, पानी की टंकी और आबादी बसी हुई है, जबकि दूसरी ओर भी खनन का काम जारी है। इसी के विरोध में ग्रामीण करीब 300 दिनों से धरने पर बैठे हुए हैं।
लोगों का आरोप है कि खदान में पत्थर निकालने के लिए रोजाना ब्लास्टिंग की जाती है। इन धमाकों से पूरे गांव में कंपन महसूस होता है और कई मकानों में दरारें पड़ चुकी हैं। ग्रामीणों का कहना है कि ब्लास्टिंग के दौरान वे घरों से बाहर निकल आते हैं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि कहीं मकान का कोई हिस्सा न गिर पड़े।
29 मई को फायरिंग, पांच ग्रामीण घायल
आंदोलन ने 29 मई को उस समय और गंभीर मोड़ ले लिया जब धरना स्थल पर बैठे ग्रामीणों पर गोलीबारी का आरोप सामने आया। इस घटना में पांच ग्रामीण घायल हो गए। गांव वालों का कहना है कि खनन माफियाओं ने आंदोलन को खत्म कराने और लोगों में दहशत फैलाने के मकसद से गोलियां चलाईं। घटना के बाद सामने आए वीडियो में मौके पर भय का माहौल साफ दिखाई देता है।
ग्रामीणों का दावा है कि करीब 40 राउंड फायरिंग की गई, जबकि पुलिस ने मौके से 9 खाली खोल बरामद किए हैं।
घरों में ताले, दीवारों में दरारें
गांव के कई परिवार अब अपने ही घरों के कुछ कमरों का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। एक परिवार ने बताया कि ब्लास्टिंग के कारण उनके कमरे की छत की पट्टियां टूट गईं। कमरे को सहारा देने के लिए लकड़ी का खंभा लगाया गया, लेकिन खतरा बना रहने के कारण आखिरकार उस कमरे पर ताला लगाना पड़ा। कई मकानों में दीवारों और यहां तक कि रसोई में भी दरारें दिखाई दे रही हैं।
गांव की महिलाओं का कहना है कि दोपहर के वक्त जब ब्लास्टिंग होती है, तो पूरा परिवार घर से निकलकर किसी सुरक्षित जगह जाकर खड़ा हो जाता है। उनके मुताबिक यह डर अब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।
फायरिंग के बाद बढ़ा तनाव, पुलिस जांच में जुटी
गोलीबारी की घटना के बाद इलाके में तनाव और बढ़ गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि कारों में आए लोगों ने दो हथियारों से फायरिंग की। वहीं पुलिस ने घटना के बाद कुछ लोगों को हिरासत में लिया है और मामले की जांच जारी है। पुलिस का कहना है कि बरामद खोलों और हथियारों की पहचान की जा रही है। इसके साथ ही यह बात भी सामने आई है कि मेडिकल जांच में घायलों को गोली लगने के स्पष्ट निशान नहीं मिले हैं।
उधर, 2 जून को ग्रामीणों ने खदान की ओर कूच करने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया। गांव वालों का कहना है कि उनकी लड़ाई किसी व्यक्ति विशेष से नहीं, बल्कि उस हालात से है जिसने पूरे गांव को असुरक्षा और भय में धकेल दिया है।
गांव छोड़ने तक को तैयार ग्रामीण
आंदोलन की अगुवाई कर रहे ग्रामीण नेताओं का कहना है कि यदि सरकार खदान बंद नहीं करना चाहती तो गांव को किसी सुरक्षित स्थान पर बसा दिया जाए। उनका दावा है कि खदान आवंटन के दौरान दूरी और सुरक्षा से जुड़े नियमों की अनदेखी की गई है। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपनी जान की सुरक्षा के लिए गांव छोड़ने तक को तैयार हैं, मगर मौजूदा हालात में यहां रह पाना मुश्किल होता जा रहा है।
फिलहाल प्रशासन, खनन विभाग, ग्रामीणों और खदान संचालकों के बीच बातचीत का सिलसिला जारी है। कुछ मुद्दों पर सहमति बनने की बात भी सामने आई है, लेकिन ग्रामीणों की मुख्य मांग अब भी वही है—या तो खतरा पूरी तरह खत्म हो, या फिर लोगों को सुरक्षित जीवन का भरोसा मिले। अजीतपुरा की यह कहानी अब महज एक गांव तक सीमित नहीं रही, बल्कि विकास और स्थानीय लोगों की सुरक्षा के बीच संतुलन तलाशने की चुनौती बनती जा रही है।
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