इबोला से जूझते युगांडा की मदद को आगे आया भारत, वायुसेना ने पहुंचाई अहम दवाएं

भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर-III विमान ने 2 जून 2026 को नई दिल्ली से युगांडा के लिए जरूरी दवाएं और चिकित्सा सामग्री रवाना कीं। डीआर कांगो और युगांडा में इबोला के मामले और मौतें लगातार बढ़ रही हैं।

इबोला वायरस के बढ़ते प्रकोप से जूझ रहे युगांडा की सहायता के लिए भारत ने एक बड़ी चिकित्सा खेप भेजी है। भारतीय वायुसेना (IAF) का सी-17 ग्लोबमास्टर-III परिवहन विमान 2 जून 2026 को आवश्यक दवाइयों और मेडिकल सामग्री के साथ नई दिल्ली से युगांडा के लिए उड़ान भर चुका है। इस मदद का मकसद युगांडा को इबोला संक्रमण से लड़ने और वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूती देना है।

इस अभियान के जरिये भारत ने एक बार फिर साबित किया है कि संकट के समय वह अपने मित्र देशों के साथ खड़ा रहता है। यह सहायता ऐसे वक्त भेजी गई है जब युगांडा और उसके पड़ोसी देश कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य (डीआर कांगो) में बुनडिबुग्यो वायरस (Bundibugyo Virus) से फैलने वाली इबोला बीमारी तेजी से पैर पसार रही है।

आंकड़ों में संकट की गंभीरता

27 मई तक डीआर कांगो में 906 संदिग्ध मामले दर्ज किए जा चुके हैं, जिनमें से 223 लोगों की जान जा चुकी है। वहीं 29 मई तक दोनों देशों में कुल 134 पुष्ट मामले सामने आए हैं, जिनमें युगांडा के 9 मामले शामिल हैं। इन पुष्ट मामलों में अब तक 18 लोगों की मौत हो चुकी है।

21 मई के बाद हालात और बिगड़े हैं। इस अवधि में 49 नए पुष्ट मामले, 8 नई पुष्ट मौतें, 160 नए संदिग्ध मामले और 47 संदिग्ध मौतें दर्ज हुई हैं। स्वास्थ्य एजेंसियों का कहना है कि संक्रमण सीमावर्ती इलाकों में फैल रहा है और दोनों देशों के बीच आवाजाही के चलते इसके और फैलने का खतरा बना हुआ है।

वायुसेना की त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता

भारतीय वायुसेना का यह मिशन उसकी फुर्तीली प्रतिक्रिया और लंबी दूरी तक राहत सामग्री पहुंचाने की क्षमता को भी उजागर करता है। सी-17 ग्लोबमास्टर-III वायुसेना का प्रमुख भारी परिवहन विमान है, जिसे आपदा राहत, मानवीय सहायता और आपातकालीन अभियानों में इस्तेमाल किया जाता है। यह अभियान दिखाता है कि भारतीय वायुसेना सिर्फ देश के भीतर ही नहीं, बल्कि दुनिया के किसी भी हिस्से में मानवीय संकट के समय तेज गति से मदद पहुंचा सकती है।

क्या है इबोला और कैसे फैलता है

इबोला एक गंभीर और अक्सर जानलेवा बीमारी है, जो इंसानों के साथ-साथ बंदर और चिंपैंजी जैसे अन्य प्राइमेट्स को भी प्रभावित करती है। यह वायरस फल खाने वाले चमगादड़, साही और गैर-मानव प्राइमेट्स जैसे जंगली जानवरों से इंसानों में पहुंचता है।

इसके बाद संक्रमित व्यक्ति के खून, शरीर से निकलने वाले तरल पदार्थ, अंगों या अन्य शारीरिक स्रावों के सीधे संपर्क में आने पर यह बीमारी एक से दूसरे व्यक्ति तक फैलती है। संक्रमित तरल पदार्थों से दूषित बिस्तर, कपड़े जैसी वस्तुओं के संपर्क से भी संक्रमण हो सकता है। इबोला की औसत मृत्यु दर करीब 50 प्रतिशत मानी जाती है, हालांकि पिछले प्रकोपों में यह दर 25 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।

इबोला का इतिहास

इबोला के शुरुआती प्रकोप मध्य अफ्रीका के दूर-दराज के उन गांवों में सामने आए थे, जो उष्णकटिबंधीय वर्षावनों के पास बसे हुए थे। 2014 से 2016 के बीच पश्चिमी अफ्रीका में फैला इबोला प्रकोप 1976 में इस वायरस की खोज के बाद का सबसे बड़ा और सबसे जटिल प्रकोप साबित हुआ। इस महामारी में पिछले तमाम प्रकोपों को मिलाकर हुए मामलों और मौतों से भी ज्यादा लोग प्रभावित हुए। यह संक्रमण कई देशों में फैला, जिसकी शुरुआत गिनी से हुई और फिर जमीनी सीमाओं के रास्ते यह सिएरा लियोन और लाइबेरिया तक पहुंच गया।

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